Rahul...

04 December 2010

तमाम होती जिंदगी में...

कुछ रास्ते..
कुछ मंजिलें.
और..
कई बेनूर सी दुनिया..
एक मन संताप को
जीने वाला
जो नहीं था उसका
जो नहीं हो सका
किसी मिजाज का
और...
नहीं कर सका वो..
पूरी सदी को
पहनने वाला
समूचे आसमान को
अपने हाथों में
समेट लेने वाला
मिजाज
नहीं कर सका वो..
तमाम होती जिंदगी में
रोज गाथा..
गूंजती है
उस आम इंसान की
जो.. सभी का है
सभी में है..
और संग-संग है .

1 comment:

  1. आम इन्सान की गूंजती गाथा ..... आह !..बहुत सुन्दर रचना ...बधाई .

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