Rahul...

30 December 2011

रात कहीं तनहा

 
नहीं था साकार होना..
उम्मीदों के दीए...
तुम कल जब चले जाओगे..
तपते सफ़र में
कुछ तो निशाँ छोड़ जाओगे
मेरा तो सब कुछ...
इतना सा मद्धिम है
रात कहीं तनहा
चुपके से गुजर जाएगी
न तो ये पल आएगा..
और न ही कभी तुम
पर इतना ही संतोष लेकर
दुनिया कुछ हाथ पर रख जाएगी
और फिर ये तस्वीर कभी नजर
नहीं आएगी .......................................

29 December 2011

जाते-जाते -4

.... अब नहीं लगता कि तुम्हारे बदलते चेहरे और करवट लेते इस साल के बीच कोई फासला बाकी रह गया हो. चलो माना कि मै कहीं नहीं था. सच में मै कहीं से तेरे आसपास होना भी नहीं चाहता था. रात के गहरे अंधकार में कोई गुमनाम सी किरण जैसे भटकती रहती हो.. सुनसान पगडंडियों में बार-बार रास्ते से भटकने जैसा.... अपने रास्तों में कहीं भी ठहराव जैसी चीज नहीं रही.. हाँ अगर कुछ रहा तो इतना कि कोई उम्मीद का दामन दूसरों के हवाले न कर दें... यह हमेशा मन के आसपास रहा..... और जब अंतहीन कथा यात्रा में कोई साथ हुआ तो मैंने सब कुछ सौंप दिया... मेरे साथ यह एक दिक्कत है..यहाँ से वो यात्रा शुरू हुई ..जिसका कोई मकसद नहीं था. मुझे हमेशा ये चीज अखरती कि किसी को बार-बार गलत समझा जाता रहा.. दुनिया को समझाने और सिखाने को हम प्रारब्ध नही नहीं थे. वर्ष के चढ़ते और ढलते वक़्त में एक मुद्दत का फासला दीखता है. कितना कुछ खोने का... हम तो पहले से इतने खुशनसीब थे कि खोने की रवायत को कभी मिटने नहीं दिया. शायद ऐसी खुशनसीबी सबको कहाँ मिलती है...... आज भी इतना कुछ अंतर्मन में शेष है ..... हम तो आदतन सब के liye एकला चलो रे... का संताप जीते हैं...इसी दम पर तो गर्व करने लायक कुछ मर्म अपनी झोली में अब तक है..... पर कुछ लोग अपने लिए अफ़सोस है..... कहकर सिमट जाते हैं... क्या कहना ? इतना ही तो तुमसे हो सकता था.... और तुमने इतना ही किया... तुम्हे अपने लिए हर मोड़ पर एक सिस्टम की दरकार होती रही.. हर चीज अपने लिए ... और जब किसी और का वक़्त आया तो फिर अफ़सोस जैसा शब्द.... अब से कुछ घंटों बाद न तो ये साल रहेगा और न ये अंतर्द्वन्द... सब उन्मुक्त हो जायेंगे... सब उस रौशनी में डूब जायेंगे जो कभी हमारे लिए नहीं था...............................
                                                              राहुल




27 December 2011

जाते-जाते- 3

पहली बार ऐसा ही हुआ. लगा जैसे आप कभी सिर्फ अपने में निमग्न नहीं हो सकते. कई लम्हा ऐसा है जो सिर्फ आपको डूबों सकता है. इतना तो नहीं जानता था कि जब वो पल आने वाला था तो सब कुछ बस यूं ही था. आज कुछ महीनों के बीतने के बाद जिस मुकाम पर खड़ा हूँ.. सब सपनों सा अदृश्य होता जा रहा है. अपनी नादानियों कि वजह से कितनों को तकलीफ दी... कई वाकई नाराज हुए. यहाँ यह कहना ज्यादा ठीक होगा कि कोई गहरे अन्दर तक इतना आ गया कि सब मुझ पे टूट गए. क्या करते ? हमने अपनी आवाज को कभी मरने का मौका नहीं दिया. क्या फर्क पड़ता है... आख़िरकार कई लोग इतना ही समझे कि कुछ मामला है. आप अंदाज नहीं लगा सकते कि हर आदमी कैसे बेपर्द होकर सब कुछ कहने सुनने लगा. सामने जो आप तस्वीर देख रहे हैं... यह एकदम हमारी कहानी कहने जैसा आवरण में घिरा है. रंग तो उसके चारों तरफ बिखरा है.. पर खुद के हालात पर एक कतरा तक नहीं. मैंने हमेशा उस सिस्टम को तोड़ दिया जो कैदखाने से ज्यादा कुछ नहीं होता. क्या किसी को अपने अंतर्मन में छुपा लेना अपराध है ?  कैसे न करते अपराध..... ये सच है कि इसकी सजा आजीवन मुझे मिलती रहेगी. मुझे हमेशा ये मंजूर रहेगा..
                                            अभी और.... राहुल

24 December 2011

जाते-जाते

 
... हम शायद कभी  उनके बारे में नहीं सोचते.. जो सच में आपकी ओर उम्मीद भरी निगाहों से टकटकी लगाये रहते हैं... खुद के आसमान को हमने इतना फलक नहीं दिया, सदा अपने खोल में दुबके रहे.. इस डर से कि कुछ अनर्थ हो जायेगा.. यहीं चुक हो जाती है... खैर ऐसा तो सरेआम हो ही जाता है..
कुछ करीब रहनेवाले लोगों को एक चीज काफी नागवार लगा. इरादा ऐसा नहीं था. एकदम नहीं..... अचानक किसी को याद करते हुए इन  सब बातों से काफी चोट पहुंचती है.. पर यहाँ कहना शर्तिया जरुरी है... मै और  मेरे जैसे लोग अंतर्मन की आवाज को ख़ामोशी के अल्फाज में कहना जानते हैं.. अपने चित्त के आसपास रखने की मेरी छोटी सी अर्जी पर इतना बुरा मान गए... माफ़ कर देना भाई... शब्दों की माला जपने और बाजीगरी दिखाने  की कभी जरुरत नहीं हुई... और न दुनिया को बदलने की रत्ती भर कोशिश की... हम तो इतना भर लम्हा को रौशन करते हैं कि अपनी यायावरी कायम रहे... बाकी कुछ रहे न रहे.... आज भी खोने को इतना कुछ बचा है कि अपने आसपास अनगिनत मंजर बिखरा हुआ है...

..... फिर आगे.... राहुल 

23 December 2011

जाते-जाते

 
साल २०११ अवसान की ओर है. कुछ दिन, कुछ पल के बाद फिर उतनी सी तलाश की जद्दोजहद में डूब जायेंगे हम सब. वर्ष की शुरुआत में हमने यकीनन कुछ भी तय नहीं किया था. किधर जाना है... और किस मकसद को जीना है ? ऐसा भी नहीं था कि अपनी मर्जी से कुछ अलग  सोच लेते. समय ने कभी इतना मौका नहीं दिया. हमारे जैसे लोगों का इतना ही अंजाम होता है... मुझे यही लगा.. आप कुछ फासला तय नहीं करते.. पर कभी-कभी उनके लिए अकेले चलना पड़ता है... जो आपके सफ़र में कभी नहीं होते.. लेकिन वो हमेशा आपके हमसाया होते हैं.... न तो इसे कोई देख सकता है और न ही कोई इसे समझ सकता है..  इस साल हमसे बार-बार एक ही सवाल पूछा गया... मैंने हर बार जवाब दिया.. जब मेरे सामने अपने लिए एक सवाल आया तो सच मानिए.. मौसम बीत चुका था. हमने अपने हिस्से का वो खाली पन्ना भी खो दिया.. जिस पर कभी भी  मेरे लिए कुछ भी नहीं लिखा गया. वैसे कितने अधूरे पन्ने आज भी मेरे साथ हैं.. मै तो हमेशा यही चाहता था कि इन्हें उन्मुक्त आसमान में छोड़ दूं .. पर इन्होंने मुझे सीने से लगाकर रखा. आज जब मैं इन्हें फिर से अपनी बात दोहराता हूँ तो कोई कुछ नहीं बोलता. इन्होंने भी वही किया.....

 .......फिर आगे ....... राहुल 

19 December 2011

 
गुनगुनाती रातों में
निढाल होती यादें..
भूले-भटके मोड़ पर
लौटकर आती यादें
माँ के किस्सों में
पनाह मांगती यादें
वक़्त-बेवक्त दामन पर
दाग लगा जाती यादें
चुप रहने की आदत में
सब कुछ कह जाती यादें
तेरे चेहरें की शिकन में
रोती-हंसती यादें
ग़ुरबत की चादर में
खामोश सी यादें
                                                              राहुल....

03 December 2011

क्या सच में ऐसा होता है ?
जलते जख्म की
वेदना ताउम्र सालती है.....
क्या सच में मन
का काफिला चुप
रेत में फिसल जाता है...
मै उस वेदना को
बार-बार कहीं छोड़
सन्नाटा को जी लेता हूँ....
तुमने कुछ रेत की
बूंदों को होठों से छुआ था
क्या सच में ऐसा होता है ?
तेरी शहद घुली चुप्पी
में आहों की ...
क्या सच में ऐसा ही होता है ? ....

23 November 2011

उस आकाशगंगा में ...

गुलाबी बादलों की एक आकाशगंगा है
कुछ मद्धिम सी चुभन है
सिमटते हुए उजालों के पार
डूबता हुआ पानी है ...
कितना ठहराव हो सकता है ?
उस आकाशगंगा में ..
उतना ही शब्द..
वही शाम रहने दो..
अनायास मुस्कान दिखती  आकाशगंगा  में
शोर सी उठती हुई
घायल पहाड़ों की ढलान पर
तुम आती-जाती रहती हो...
तुम हवा को अपने होठों से
धराशायी करने की जिद में बैठी हो
पर ऐसा नहीं.. कभी नहीं..
पिघलती हुई सिर्फ वो शाम
मेरे आकाशगंगा में जी उठी है..
अलबेली बारिश की बूंदों में
तुम गुमसुम सी चुपचाप
पास ही तो मेरी बारिश में
भींगी सी मदहोश थी...
न जाने नींद का भ्रम था
या .. सच में एक अप्रतिम मखमली स्पंदन
                                                                                               राहुल...

20 November 2011

छोटी सी इबादत- 12

कैप्शन जोड़ें
अपनी मर्जी से आखिर हम आवारगी तय नहीं कर सकते. मै उस पेड़ को आज भी नहीं भूल पाती... जिसके दरख्तों में भी इतने जख्म कि मन सब कुछ खो बैठे. नहीं समझ सकी..... तुम इन सब के बीच क्यों डूब गए ? सुबह- सुबह की गीली और चमकते सूर्य की मीठी धूप में अनायास तुम्हारा दिखना.. अगले पल की वीरानगी में नजरों का सूनापन. सदियाँ थक जायेगी.. और मुमकिन है कि इतना मंजर गुजरे कि मौसम को एहसास तक  न हो..तुम पत्थरों की पदचाप को भी जी लोगे. तुम हमेशा कहा करते थे.. सब कुछ मौन कर देना.. मगर तुम अपनी साँसों की उमस को कहाँ मिटा पाओगे ? रात के थकते मन कारवां सा होने लगता है. जैसे सपनों को अपनी यात्रा में तलाशने की ख्वाहिश.. पर ये क्या... मेरे आँचल में एक कतरा तक नहीं बचा. न जाने इतने ही  ख्वाब तक मेरी पलकों पर टिक पाते हो.. न जाने फिर कभी अपनी हाथों में तुम्हारी उमस को कैद कर पाउंगी ? 
                                                                    आगे अभी और भी .....
                                                       
                                                                                                                                                राहुल

02 November 2011

तमाशा सा हुआ है...

छाने लगे ठण्ड के एहसान
कुछ बादल चुपचाप तमाशा सा हुआ है
एक संकरी गली में अँधेरा घूम रहा है
इंतज़ार कि...कुहासे के साथ मिल जाए तो...
कितना क़यामत सा पल होगा..
                                                             राहुल
 रात चुपचाप दबे पाँव चली जाती है
रात खामोश है, रोटी नहीं, हंसती भी नहीं
कांच का नीला सा गुम्बद है, उड़ा जाता है
खाली-खाली कोई बजरा - सा बहा जाता है

चाँद की किरणों में वो रोज़ सा रेशन भी नहीं
चाँद की चिकनी डली है कि घुली जाती  है

काश इक बार कभी नींद से उठकर तुम भी
हिज्र की रातों में ये देखो तो क्या होता है ?........


                         (गुलज़ार साहब के पुखराज से ) 

30 October 2011

मै..नहीं...हम...नहीं...

 
तुम मेरी निगाहों को गैर कर दो.
इतना ही तो होना था...
मेरा लम्हा खुद कहीं पैवस्त रहा होगा .
सच में.. ये अकस्मात् नहीं था
तुम मेरे लिए खाली हाथ ही तो आये थे......
इतना कुछ भी आसान गर होता....
जबकि किसी का वजूद
तेरी लकीरों में चस्पां था.
सदियों से .....
तुमने दो लकीरें खींच रखी है..
एक.. जिसमें मैं उसके जद में रहता हूँ.
दूसरा ...तुम उस लकीर के आसपास
आडम्बर का घेरा रचती हो...
मै..नहीं...हम...नहीं..
हजारों सागर का आर्तनाद
मेरी साँसों में टूटता रहता है......
सच में ...ये सब अकस्मात् नहीं होता ..

                                                                                     राहुल




29 October 2011

रात नहीं होती .....

रात जो ठहर जाती है.
रात जो गुम हो जाती है.
रात जो परिंदों को ....
अपनी कहानियों का हिस्सा बनाती है..
शायद उस रात का अपना आशियाँ नहीं होता...
रात का अपना संबल नहीं होता.
बच्चे दूध की भीनी महक
रात में गुनगुनाते हैं...
कुछ सपने लड़कियों के ..
रात में टिमटिमाते हैं..
रात जो ठहर जाती है
रात जो सभी तिनकों को
अपने घोंसला में सजाती है ..
शायद उस रात का अपना मकान नहीं होता..
प्यार की चिट्ठियाँ रात में,
तन्हाई....रुसवाई  रात में,
अलबेली कायनात रात में,
पत्तों पर गिरती ओस....
 रात में बुनी जाती है ..
शायद उस रात का अपना कोई आइना नहीं होता
रात के सफ़र में यकीनन अपनी कोई ....
रात नहीं होती ................


                                                                                     राहुल

27 October 2011

छोटी सी इबादत -11

तुम ...कहाँ सो गए...
...किसी को भी शायद भ्रम सा हो जाए.. कहीं तो कुछ नदियाँ घुलती रहीं होंगी..तेरी कतरन ....बिलीन होती पातालगंगा में मिल जायेगी...मुझे भी एक भ्रम ने जिन्दा रखा है.मै हमेशा तुमसे कुछ चुराती रही हूँ...तुम जानते भी थे इस बात को..  पर तुम मुस्कुराते रहते थे. खुद की खींची लकीरों पर जो इंसान हांफता.. थका-मांदा अभी लौटा है ...वो तो सिर्फ चुप रह सकता है......और ऐसा ही हुआ भी.......
 मै इतनी सारी नदियों के शाप से कैसे मुक्त हो सकूंगी..तुम तो सभी जगह, सभी धाराओं में मचलते हुए बिलीन होते रहे..कितनी कतरन समेटेंगे आप ? आज वक़्त किसी मोड़ पर नहीं खड़ा है, बल्कि खुद के कटघरे में संताप की दुहाई दे रहा है.... मुझे छोड़ दो..मुझे गुजर जाने दो..मुझे उसी धुंध में गुम जाने दो.....मुझे होश नहीं है अब......तहसीम मुनव्वर की सिर्फ एक लाइन ...जाने तुम कैसे सो जाते हो ? ....जाने तुम कैसे सो जाते हो ?........

                                                                        राहुल

14 August 2011

हाथों पर कुछ रखकर

चले तो गए....
जितना कहते थे
हाथों पर कुछ रखकर
 मौन ..बिना कुछ
मांगे...
 सराबोर अपने...
संताप को चिपकाये..
 चले तो गए..
असहज..कातर
 साँसों का गला
घोंट ...चुपके से
उतना ही छोड़ ..
 चले तो गए..
एक-दो उदास पेड़
के आसपास ..
किस्सा रोप कर
 अपनी नज्म का
 चुपके से
...  तुम चले तो गए................

                                                                  राहुल

सांझ में सना हुआ

अपने मन से हटा देना
इतना संबल सजा कर रखना ....
आगे गहरी तपिश की...
रात हो शायद
जो कुछ भी कहा...
सब सांझ में सना हुआ

छोटी--छोटी थालियों में
भींगी हुई ...
अनमनी सी पड़ी रोटियां
बुझती हुई चूल्हे की
 डूबती हुई कहानियां
अपने मन से हटा देना

टूटे घरों में निढाल नींद
 रात के मजार पर...
 खुशबू में लोटते
लौटते पलों को
वापस मत आने देना

 परिंदों के काफिले में
टिमटिमाती नन्ही तितलियाँ
बसेरा तलाशती ...
भींगती....भागती
अनबूझी पहेलियाँ
यूं ही ....
अपने  मन से हटा देना

                                                        राहुल

13 August 2011

मखमली चाँद के पार

       चाँद के पार की दुनिया ... कितना मखमली ... कितना शीतल...हम कई जन्मों तक उसी में अपना सब कुछ तलाशते रहे ...तो क्या मिलेगा ? शुरू से अंत तक न जाने कितनी राते टूट कर तारों में मिल  जाती है और हम  ताकते रह जाते हैं ......मै अपने आप से कह नहीं पाती ...आपने एक ख्वाब दिया ....कितना  मदहोश कर  देता है आज मेरे हाथ में अपनी कोई कहानी नहीं......

       ...कच्ची उम्मीदों  को कभी बारिश की अदाबत महँगी पड़ती है.. तो कभी सन्नाटों में डूब जाने की चिंता ..आज आप अपने मन से कितने दूर हो गए हैं..चाँद से भी बहुत पार.. मगर मैंने आपको जाने कहा दिया...थोडा सा मैंने चुरा लिया..मेरे चारों तरफ पश्मीने की एक नाजुक और नर्म दीवार है..दम घुट जा रहा है और चाँद मखमली आगोश में कैद है..हर तरफ राख में लिपटी तुम्हारी पवित्र साँसे तड़प रही है.. इतना सा मंजर दे गए हो तुम ....न...न..आप.. कभी जी में आता है .....आज की रात के बाद उसी राख में मिल जाऊं ....आप इतना  तो एहसान करेंगे मुझ पर ...पर सहर की उम्मीद नहीं ...चाँद थोडा सा बाहर निकल रहा है अपनी आगोश से ....हम कितना बेवश हैं..मेरी भी मजबूरी रही होगी...कच्चे रेशम में लिपटी एक लड़की सदियों से अपना  लिबास बुन रही है ...पर हर  बार एक सिरा अधूरा रह जाता है...कोई देह को पा लेता है तो कोई आत्मा को चुपके से अपनी  पूरी कायनात में समेट लेता है...और चाँद के पार की दुनिया  में  गुम हो जाता है ...ठीक आपकी तरह.....

                                                                                                                        

12 August 2011

[Image]
अभी कुछ वक़्त पहले ही एक वाकया हुआ. हमने किसी को कुछ शब्द वादे में दिए. फिर बात ख़त्म हो गयी. हम सब मगन हो गए... पेड़ों पर नए मौसम के पत्ते आने लगे. सब नया सा हो गया. वादों में दिए गए शब्द मेरा पीछा करते रहे ... मै चुप रहने लगी ... कुछ भी किसी से कहा नहीं .. एक पल को लगा कि कही एक तार का सिरा टूट गया है. मै उन अधूरे वादे को लेकर पशोपेश में थी. जाहिर है शब्दों की तलाश बेपरवाह हो गयी.. मंजर जाता रहा .. पत्ते जब बिखर कर जमीन पर आये तो एक सदी गुजर चुका था.... वक़्त ने एक सलाह दी थी.... मुझे अपने आसपास से मिटा देना.. गर ऐसा नहीं कर सके तो राख तक नहीं बचेगी .. अपने सामने की तस्वीर से अपनी छाया समेट लेना.. सबके लिए यही मुनासिब होगा.. सनातन काल तक.....तुम कितना अपना सा कहते थे... ये सच भी था .... तुम जो भी थे... बेहद निर्विकार ... चोट खाते रहने की आदत में बेमिशाल थे ... शायद तुम्हारे दिए हुए शब्द मै सहेज नहीं पायी ... लगा ही नहीं ... कि मै तुम्हे कुछ प्रतिदान दे सकूंगी .... उसके बदले ... मन में एक वहम का सन्नाटा है... कैसा पल ... सब आसान नहीं .. तुम तो उन्ही शब्दों की खाक में यायावर होगे... सच ... एक यायावर से ज्यादा कुछ नहीं थे तुम ......... मैंने हमेशा तेरे अन्दर तुम्हें तलाशने की कोशिश की .... यह कितना मुश्किल था. कभी भी तुम......

29 July 2011

ऐसे ही डूब जाते हैं ...

जब कोई चेहरा था 
कुछ अपने पल सा ...
आधी सी जमीन पर 
एक उम्मीद उगी थी ...
मखमली घास पर 
वही चेहरे ....
वही पल .....
वही उम्मीद ...
काँटों की जद में घिर गया 
कुछ कहा नहीं ...
रोया नहीं ...बस जीता रहा .....
हम सब ऐसे ही डूब जाते हैं ...
हम ऐसे ही प्रारब्ध जीते हैं .....
जब अपना कुछ नहीं होता 
कुछ बारिश की नेमत है 
कुछ तिनकों का आसरा 
हम सब ऐसे ही डूब जाते हैं ...
                                                                          राहुल

22 May 2011

छोटी सी इबादत - 10

 
मौसम ...  जो इस बार आया और चुपके से चला भी गया .....न तुम कुछ कह सके .. न वो कुछ याद दिला पाया... पर कुछ साथ चिपक सा गया ... जेहन में ... ये बताने को कि हम किसी वक़्त के यायावर सा तुम्हे देखते और खोजते रहेंगे ..... कोई एक दिन ही तो होता है ... समेटने को ... खुद को भिंगोने और कही डुबो देने को ... शायद वो भी नहीं एक पल के कतरे में कितना एहसास सिला हो गया .... तुम जब देखोगे ... फुरसत में ...बंद आँखों से .... हमने तो वो भी कहीं खो दिया... धीमी सी ... सिली ... सी आंच पर कोई तुम्हे पिछले जन्मों से एहसान बटोरने वाला आदमी मानकर खोजता फिर रहा है .... कुछ दुबिधा तुमने तय कि ......जैसे सब कुछ कोई और किसी का अकेला हो... मैं ऐसा तो नहीं जानता...फिर ऐसा मौसम ... बारिश .....बूँदें ......आएगा नहीं ....तुम कही और होगे और मुझे इतना मालूम है कि तुम सबको माफ़ कर दोगे......मै ठीक   जानती हूँ .......तुम ऐसा ही करोगे ....... 
                                        अभी और भी .............राहुल

02 May 2011

राजेश के लिए

प्रिय राजेश,
                     उम्मीद है आप सानंद होंगे. काफी अरसे बाद याद करने के लिए धन्यवाद. मुझे बहुत अच्छा लगा आपका कमेंट्स देखकर. सच कोई मेरे शब्दों और उसके इर्द-गिर्द की दुनिया को इस कदर नोटिस लेता है. कभी- कभी यकीन नहीं होता. आपने मेरी कविताओं को पढ़कर जो भी अबतक मतलब निकाला, वो मेरे लिए अमूल्य है. इस बात को कहने में मुझे कोई भूमिका बनाने की जरुरत नहीं है. मुझे सचमुच बहुत अच्छा लगा.........
राजेश, मैंने अपने अपने लिए कोई लकीर तय नहीं की. यही वजह है कि मेरे जैसे लोगों का अंजाम कभी अपने मुकाम तक नहीं जाता. अधूरा रह जाता है.. इसके बावजूद चलते रहते हैं....जहाँ तक मेरे शब्द और उसके घेरे का सवाल है तो हम इतना ही कहेंगे कि वो सभी मेरे साथ हमेशा साये की तरह मुझसे लगे रहते हैं...कौन अपने अतीत को अपने साथ जिन्दा रखना चाहता है ? कोई भी नहीं.....मै भी नहीं..मगर  मेरा बहुत कुछ उसी में जिन्दा है. सबकुछ तो नहीं कह कह सकते....
... हमने कभी कुछ तय नहीं किया. हमेशा ये सोचा कि मुझे क्या नहीं करना है ? क्योंकि ... मुझे क्या करना है.. ये तो मुझे पता है. यहाँ हर रिश्ता आपसे समर्पण की उम्मीद करता है. माँ-पिताजी, भाई-बहन, पति-पत्नी और जाहिर है बच्चे... ये सभी रिश्ते आपसे अपने होने का एहसास दिलाते हैं और बदले में जाने-अनजाने कुछ उम्मीद कर बैठते हैं. ऐसा होता रहा है और सब दिन होगा....... मैंने भी यथासंभव उम्मीदों को पूरा करने की कोशिश की है. कितना क्या हुआ, ये नहीं जानते.... हाँ.. एक चीज़ और..  ये जीवन उनका है... जिसने जीवन दिया...मेरा इस पर कोई हक नहीं.... मै २४ घंटे इस बात पर अमल करता हूँ....
अब बात उनकी जो चुपचाप आपके सफ़र में शामिल हो गए.. न कोई रिश्ता, न कोई नाता...मगर आपके हो लिए.. तो सदा के लिए.... अब उनकी व्यथा, मेरी व्यथा..
राजेश... जब बहुत बहुत महीन धागे को सुलझाना होता है तो काफी धीरज और हौसले से उस धागे का एक सिरा खोजना पड़ता है. नजर नीची करके सुनना पड़ता है. ये बहुत आसान नहीं है... इसमें कई सदी  लग सकती  है. हमने कभी भी अपनी तारीफ़ के लिए शब्दों को नहीं लिखा. कभी भी नहीं.. ये कोई काल्पनिक या फिर कुछ नाम-दाम बटोरने का जरिया नहीं रहा... ये एकदम नितांत निजी और निजी.
राजेश, आप kaise galat हो सकते हैं ? और मै kaise आप को ignore कर du.
                                                                                                                  Rahul..




16 April 2011

छोटी सी इबादत-8

 
..कुछ यात्रा पहले की... खुशनुमा पल.. जैसा दिखा .. तेरे साये से बचना कहाँ आसान था. उसके पहले चेहरा अपनी कहानी सुना गया था. आत्मा बेजुबान जंगल  सा कही फँस गया था. क्या कहे ? आँखों में इतने ख्वाब.. फिर भी चुपचाप मौन.. हाथ जोड़े खड़ा मदहोश बेदम सी रात. ऐसे आप क्यों देखते हो ? कौन सा सन्नाटा तुमने बुना है मेरे लिए.... मैं  कहाँ कुछ चाहती थी...ठीक उसी पहर कुछ सपने टूटे.. कुछ जुड़े... जैसे बहुत देर तक धूल में सने  परिंदों का कारवां.. कोई निढाल.. पस्त तो कुछ आसमान को निर्विकार सा देखता..... सफ़र शुरू हुआ.. कही लौटना था... समझ नहीं आया.. घर लौटे कि कही से विदा हुए. आँखों में कुछ छुपाने के बेमतलब से मायने ... पत्थर, जंगल और कहीं-कही दीखते असहाय से इन्सान की गाथा... हम तो कही ज्यादा उजाला तलाश तलाशने की जद्दोजेहद में भींग रहे थे. कैसे हुआ ये सब ? न. न. न...... ऐसा नहीं होना नहीं चाहिए था.. कोई तो जरुर कहेगा, कितने लाचार हो गए आप ? भीड़ और उमस में डूबे हजारों चेहरे.. कौन जानता है..किसे फिक्र है... बैठ कर सोच नहीं पाया.. सांस टूटने लगी... लगा.. कौन सा प्रारब्ध.. तुमने जिया है ? खिड़की से देखा... सब कुछ छूट रहा है.. फ़ोन का इन्बोक्स खोला... कुछ सन्देश है मेरे लिए...कुछ खाए कि नहीं ? फिर कही और भटक गया ? क्या जवाब दे ? सफ़र ख़त्म होने को था.. पर कही कुछ नहीं... कितना मुमकिन है अपने को खुद से बाँट लेना.. सांझ ढल गयी.. रात थोड़ी देर में खामोश हो जाएगी.. तुम वहां से कही और होगे... जानती हूँ .. आपके बारे मेरे.. किसी को नहीं कहूँगी.. खुद से भी नहीं.... फिर जंगलों में सांस टूटती नींद... माफ़ कर देना.. मैं नहीं चाहता था उस पल को...
 
                                                     राहुल
  

12 April 2011

एक-दो नजरें..

 
कुछ सुनहरे राख का मंजर
बिखरा मिला
उस समर शेष में
जहाँ समंदर एक
काफिला सा...
पिघलते जज्बात को
अपने में भिंगोये
गुम हो रहा है...
कभी ऐसा भी हुआ
थके मन से
सपनों को मुक्त करना.. 
सौ संताप में... हर बार 
एक-दो नजरें..
जर्जर यायावर वक़्त 
हाथ से निकलता 
चेहरे का धुआं ..
और...
कुछ सुनहरे राख का मंजर
तुम नहीं भी कहोगे तो...
सिमट जायेगा..
तेरी साँसों में मेरी रूह
जन्म लेगी..
मै उस वक़्त शायद..
रहूँ.. न रहूँ
                       राहुल

06 April 2011

मुक्त कर सको तो...

मुझे सवालों के घेरे में
रहने को कहा गया..
जो भी कुछ मेरा छीन गया
कैसे कुछ स्पर्श..
चुपके से..
अलफ़ाज़ बनते-बनते
कही खो सा गया..
मुझे सवालों के घेरे में
रहने को कहा गया........
कितनी सी बिखरती
स्याह हसरतें
ओ... अभी पलकों पर जो शेष है
तेरे चेहरों की शिकन
में जो पल गुजरता गया...
उसे बस.. एक बार
हाँ.. इतना ही कह रही हूँ
दे देना..
..गर कही मेरे आँचल का कोना 
तुम्हे दिखे..
इतना सा सवाल.
और अब होने-न-होने के  फासले
मुक्त कर सको तो...
दे देना.....
                                      राहुल


22 March 2011

छोटी सी इबादत- 7

एक बूँद.. दो बूँद.. और न जाने कितना बड़ा समंदर.. कांच के इस पार की दुनिया.. अनचाहे पत्थरों की मार से बचती हुई.. रूक-रूक कर सांस लेती हुई.. देखना तुम.. बाहर का मौसम.. बाहर की हवा तेरे जेहन में पैबस्त न हो जाये......
 नीला आसमान.. कच्ची धूप.. और कांच के इस पार छनकर आती हुई तेरे भींगे हुए चेहरे की चटक यादें.. मै नहीं जानना चाहती आगे का कुछ भी.. फिर से मायने तलाशने की ललक.. तुम ही तो कहते थे... तेरे बगैर... तेरे बिना तपती हुई रेत पर नंगे पांव.. अनर्थ सा.. बेमजा.............
दोहरी जिन्दगी... जो कह दिया.. मान लिया.. अरे हाँ.. माँ भी कहती थी... शीशे की दीवार पर तेरे जैसा एक हमशाया दिखने लगा है.. बूंदों की दुनिया से वापस लौट सको तो लौट आना... अब कांच की दीवारों पर भी दूब की लत्तर उगने  लगी है..... 
                                                         आगे और भी.......                                 राहुल
                            
                  

नम सी तड़प

कितना सा गुजर गया..
बस इतना सा गुजर गया
वक़्त जो तेरा-मेरा था....
किस गली में ठहर गया

तेरे जो किस्से थे..
मेरी भी कुछ बातें थी..
बस दो बूँद सी कुछ रातें थी..
न जाने कहाँ  बिखर गया..

खामोश पहर का सन्नाटा.
मेरी पलकों पर पसर गया..
नम सी तड़प तेरी यादों का
मेरे शब्दों में संवर गया

कितना सा गुजर गया..
बस इतना सा गुजर गया
वक़्त जो तेरा-मेरा था....
किस गली में ठहर गया
                                                   राहुल

18 March 2011

होली में इतना ही...

रंग बातें करें...
बातों से खुशबू आये.....
दर्द फूलों की तरह महके
जो तू आये..............
                                        राहुल

16 February 2011

छोटी सी इबादत-6

 
 
लम्बी रातों में बोझिल से दिखते मन की यात्रा में तुम निर्विकार जब मिल जाते थे... तो न फिर कोई दर्द........... अब कुछ नहीं बताना... आत्मबोध में बहती हुई तेरी बातें... सालों बाद वही रात.. उतना ही दर्द...   कहाँ से कहाँ सब चले गए.. तुम्हारा नाम तो मेरे पास ही रहेगा.. उस शब्द का सीधा सा मतलब..  

अपने गाँव में जमीं की देहरी पर कदम रखते ही बिखर गया  सब कुछ.. सब उस किताब की तरह.. जिसके  शब्द खुद के पन्नों में अपना वक़्त तलाश रहा है.. उस जमीं को सीने में दफ़न करने को...कुछ अंश तो मुझमें मिलेगा.. कभी तुम आये थे मेरे घर.. और मेरे आँगन में चुपचाप...दूसरों को सुनते... अकेले... अचानक से सुनते-सुनते चले गए.. फिर वो मंजर नहीं आया...
खुद में इतना खो जाना...कितनी वीरानगी.. जितना अन्दर जाती हूँ.. एक बेतरतीब कविता आकार लेती है.. लगता नहीं कि अब तुम... मेरी इबादत का पन्ना पहले भी अधूरा था... आज भी वैसा ही... तुम्हें एहसास तो जरूर होगा.. और डूबोगे भी... मुझे तो रेत की डगर पर चलकर जाना होगा...  फिर से जतन...
                                                                                                               .........................आगे और भी

12 February 2011

छोटी सी इबादत- ५

 
तुम हकीक़त ही थे.. मैंने ही इसे कुछ और चोला पहना दिया.. न बन सके उस रिश्ते का इलज़ाम तुम पर कैसे लगा दूं ? जो फलसफा मै तेरे चेहरे पे पढ़ नहीं पाई.. उसका खामियाजा मेरी लकीरों को भुगतना तो होगा ही............ये उदास-उदास चेहरे, वो हंसी- हंसी तबस्सुम ......तेरी अंजुमन में शायद अब कोई आइना नहीं है
तुम जब सवालों में घिरते थे तो फिर उस घर में, अपने कमरे के एकांत कोने में तुम्हें देख मै.. ना कुछ समझ पाती और ना ही कुछ समझा पाती तुमको.. चाहकर भी.....! मुझे तुमने उस पत्ते की मानिंद उड़ने को छोड़ दिया.. जिसका खुद का चेहरा जर्जर था.. और बेजार भी... आज कहा चला गया सब कुछ.
.....अजीब सी अदा.. पूरी तरह नाटकीय चलता जीवन चक्र.. रंगे चेहरे.. एक.. पर एक.. सब्जबाग.. किसको देखूं.. किसको छोड़ दूं... अपनी इस दुनियादारी में खुद के एहसानों का बोझ खुद पर इतना ज्यादा है कि किसी और के लिए तुमको छोड़कर कोई नाम याद नहीं आता.
तेरे घर.. तेरे कमरे.. ओह...भींगते पन्नों पर चुपचाप उतरती हुई ओस.. उस चांदनी रात का कर्ज है.. जो अकेले मैंने तुम्हारे लिए मांगी थी.. रात के अधरों पर बेचैन.. थकी सी हंसी चस्पा है.. अलसाये रातों की अंतहीन कड़ी है.. कुछ अजन्मा सा.. भोर भी..
                                                                                                                             ...आगे और भी

08 February 2011

छोटी सी इबादत-4

 
....सब कुछ कल्पनातीत सा.. नींद में यथार्थ से लड़ने का बोध.. ओह.. कैसा होगा हमारे चाहने.. न चाहने के द्वन्द में पिसता हमारा लम्हा... कातिल भी वही.. मुंसिब भी वही.. ये कहना कि तुम्हारा अंजाम.. तुम्हारे हक में मुनासिब नहीं रहा.... मै नहीं मानती... जार-जार तो नहीं.. हाँ कहूँगी कई-कई बार...इतने जर्जर.. कमजोर और बेबस हो जाओगे... पता नहीं था......
कोई आइना तेरे मिजाज को पढ़ तो नहीं सकता... आज भी तेरे नाम व तुझको समझने की गलती बार-बार दोहराती रहती हूँ. अगर कायनात में टूटी-फूटी जरा सा भी मेरे दामन में कुछ सौगात मिलना बाकी हो तो.. बस इतना हो कि गलती बार-बार करूं..
मुमकिन इतना तो अब भी लगता  है कि भोर की पनाह में जब सांस डूबती-उतराती है तो अनंत यात्रा पर.. मिट जाने को मन करता है.. दिन चढ़ते चला जाता है.. फिर ख्वाब.. आसपास चिपके हुए उस सीलन का.. जो अनचाहा है.. अकारण है.. शाम होती है... फिर देखती हूँ.. और नजरें खुद की चुभन को बर्दाश्त नहीं कर पाता...,  चारों तरफ  शब्दों का आडम्बर है.. रिश्तों की अनकही व्यथा है... ये कौन सी सदी है.. ये कौन सा जन्म है... तुम कतरों में बिखरते हो.. मै चीखों में सो जाती हूँ.. ....            
                                                                     ......    आगे और भी

07 February 2011

खुद के साये का पहरा है...

काल के अन्तःघट में
जो सहरा में गुजरा है..
खुद के साये का पहरा है
वो कौन है.. वो कौन है...
निर्दोष रेत के गर्भ में.
बेमन सांसों की परवाज है
उदास वन की रश्मियों में
नब्ज थमती हुई आवाज है
वो कौन है.. वो कौन है...
कुछ दर्द नाजुक पानी  है
नीरव उम्मीद रोमानी है
काल के अन्तःघट में
जिनकी बेलौस कहानी है
वो कौन है.. वो कौन है...
ना तेरा पल..ना मेरा पल
सांझ पहर के क़दमों में
गुमसुम सा जो ठहरा है
खुद के साये का पहरा है
वो कौन है.. वो कौन है...                     
                                                राहुल

05 February 2011

छोटी सी इबादत-३

 
.....कितनी बातें छूट जाती है.. सूनी-सूनी गलियों में हजारों मंजर भटक रहा है. उसी मोड़ पर... वक़्त की शाखों पर जो लम्हा टूट कर उन गलियों में बिखरा हुआ है.. सोचती हूँ.. उन्मुक्त आकाश में छोड़ दूं.. परिंदों की उड़ान में समाहित कर दूं. लेकिन ऐसा होगा.. लगता तो नहीं.. सच.. .....कितनी बातें छूट जाती है.. अथाह आसमान का गुनाह क्या हो सकता है ?  वो तो सब कुछ कैद करने को आतुर है. मै भी उस आसमान में ना तो बिखर सकी और न मिल सकी. आकाश आज भी कहता है....... गुजारिश करता है...... मगर..  तुमने कहाँ मुक्त होने दिया.. ना तो खुद में मिलने दिया और ना ही बिखरने दिया... इतना तो मै भी जानती हूँ कि कच्चे रेशम जैसे नर्म रिश्तों में पाने की कोई लालसा नहीं थी.. तुम यही चाहते थे.. सच तो ये भी है कि तुमने कभी कुछ चाहा ही नहीं... तुम आज भी वैसे ही होगे... 
......मुझे सपनों से सदा ही विरक्ति रही. अभी तो अभी... मिले ना मिले.. तुम्हारी बातें थोड़ी जुदा थी. एहसास इतना करती थी कि  तुम अपने अंतर्मन में कुछ गढ़ते रहते हो.. कभी-कभी तुम्हें देखती तो मालूम होता.. आज के सफ़र में मुझे सपनों की परीकथाएँ जीने के लिए तुमसे कुछ माँगना पड़ता है.. सब कुछ नीरव सा.
कहना असंभव है..जाने सो जाने..जिए सो जाने.. अनुभव हो जाये.. कबीर तो इतन ही कह गए.. जो भी अपने शीश को रख दे, ले जाये जो भी अपने शीश को गिरा दे, उस पर बरस जाता है प्रेम का मेघ, बहने लगता है उपर से, बंटने लगता है दूसरों को... और ऐसी मुक्ति.. जहाँ मोक्ष की भी चाह नहीं.....

                                                                                                                              आगे और भी...

04 February 2011

छोटी सी इबादत- 2

 
..... मै तब जानती थी कि बारिश की बूंदों का तुम पर कोई खास असर नहीं होने वाला. कितना हल्का सोचती थी. तुम हमेशा दूसरों को माफ़ करते थे. आज भी करते होगे. तुम यहाँ जस का तस रहोगे.
                   बारिश की कतरनें थोड़ी देर के लिए राहत  तो देती है.. बाद में उमस का सैलाब दम घोंट देता है. घर की देहरी और छतों पर तुम अनायास दिख जाते तो.. कुछ टूट जाने को होता.. मगर तुम ओझल हो जाते.. ये चुभ जाता. तेरे कमरे में सब कुछ करीने से होता.. चुप सा किस्सा बुना जाता.. जब तुम नहीं होते तो मै एक-एक चीज को देखती.. आत्मसात करती. और जो समेटना होता वो समेट लेती. जिन कामों के लिए उस कमरे में जाना होता.. वो काफी उमंग से होता.. लेकिन तुम चुप रहते. कभी- कभार तुम कुछ कहते तो अनायास ही सब कुछ बैठ जाता.. मन को आखिर एक असीम लज्जत की जरूरत होती है.. शब्द बेमानी हो जाते हैं अगर चुप्पी सटीक निशाने पर चुभ जाये.. तुमने यही किया.. कितनी बड़ी सजा दी है तुमने ? खुद को भी तो नहीं बख्शा तुमने. आज जहाँ कही मै हूँ और जहाँ तुम... वो करीने सा कमरा मेरे साथ-साथ रहेगा... तो तेरे पास मंद-मंद सी चुप्पी......
                  एक अकेला कोई कैसे तनहा रह सकता है ? दरअसल ये खजाना एक नेमत है. सदा सँभाल कर रखने के लिए.. ये नेमत जितना बिखरता है.. उसकी खुशबू उतनी लरजती है.. जितनी तपती है.. उतना ही निखार आता है.. वक़्त तो मुगालते में है कि सजा हमने तय कर दी.. अब भुगतो और प्रारब्ध को जीते रहो.. मगर ये पूरी तरह एकतरफा नहीं होता.. चलो.. स्वीकार किया.. देखेंगे.. किस्मत की लकीरों में कौन सी पर्ची निकलता है.. वक़्त का क्या है...........
                  ....... हाँ.. तो तुम कुछ मेरे लिए लाये थे.. कहाँ  से कहाँ खो जाती हूँ... शून्य में जन्मी यादें... आज तो सब कुछ भूल जाने को मन करता है... मन करता है कि  बीच गंगा की लहरों में विलीन होकर समाधि ले लूं.. तुम कुछ और भी थे... यह तब दिखा.. मेरे पास इतना ही शेष रह गया है.. तुम्हारे लिए सोच नहीं पाई कि क्या.......
                                                                            अभी और भी

03 February 2011

छोटी सी इबादत


 

कितना बदल गए. आँखों से दूर होकर भी तुम सबकुछ थे. कल भी रहोगे. चुप रहने की तुम्हारी जिद कभी खत्म नहीं होगी .तेरे नाम का मतलब कभी मुझे बताया गया था. छोटी सी इबादत में सिर्फ तुम ही थे. आज भी हो...
                        याद है तुम्हें.. शायद याद होगा.. एक बार भींगे मौसम में तुम बारिश में सराबोर होकर आये थे. मै चुपचाप तुम्हें देख रही थी. तुमने भी मुझे चुराकर देख लिया था. वो भींगा दिन हमेशा मुझसे चिपका रहा. तुम उस दिन कुछ कहना चाह रहे थे. वैसे तुम हमेशा खामोश रहते थे. मगर वो दिन मेरा था. मेरी कुछ मन्नत पूरी होने वाली थी. तुम बारिश में निमग्न थे. मै तुममे.. कितना अजीब था वो पल. उस घर में तुम हवा की तरह दिखते थे. घर से जब निकले तो चीख सा सन्नाटा.. और जब घर में लौट कर आते  तो दरवाजों के साथ कई चीजें खुलती.. मन... आत्मा और न जाने क्या-क्या ? तुम भागते.. और एकदम से दूर हो जाते.. तेरे घर में होकर मै सबकी थी.. सिर्फ तुम नहीं... खैर.. बात उस मौसम के गीले पन्नों की हो रही थी. मै हमेशा.. हर पल... तुमको खोती रहती.. 
           तुम कही और रहते.. मै हरपल तेरा अक्स तलाशती रहती. ठीक उस तरह.. जैसे साया को समेटने की जद्दोजेहद करती उम्मीदें.. जैसे साँसों में ग़ुम होती कहानियां...  आगे और भी


  

18 January 2011

जिन्दगी से मिले.........

                                                       जब कभी हम यूँ जिन्दगी से मिले
                                                       अजनबी जैसे अजनबी से मिले......
                                                       फूल ही फूल हमने मांगे थे
                                                       दाग ही दाग जिन्दगी से मिले.........
             
                                                                                          courtesy by-  classic story - jagjit singh

17 January 2011

देर से.. मिले

तेरी मर्जी के
सफ़र में
सोचा था...
 कहीं मिल जाता
वक़्त जो इतना था..
काँटों को समेटते..
बटोरते
तेरे अल्फाज
बिखर गए
उस सफ़र में
जहाँ..
घर आये मेहमान
जैसा दिखा
तेरे आँगन का रास्ता
जलती-तपती
वीरान सी बिखरती नींद
देर से.. मिले
कोई हद..
न तो तेरे नाम पर ..
जो सोचा था 
जीया था
 भोर में जन्म लेती
तेरी सदी के पहर में
बिखर गए
जहाँ तुम्हारे बाद
कोई चेहरा
आईने सा..
अब नहीं दिखेगा
जो बचेगा......
जलती-तपती नींद
उसी सदी में
 तेरी मर्जी के
सफ़र में... शायद
होंगे........
                             राहुल

                                       


 

15 January 2011

मुनचुन के मन से...४

... गाँव के माहौल में बेफिक्री का जो आलम था,  वो शहरों में ख़त्म हो गया. मुझे आज भी यही महसूस होता है कि कम पढ़े लिखे लोग कितनी ईमानदारी  से अपनी जय-पराजय, गिला- शिकवा और हर पल की जद्दोजहद को सामने रख देते हैं. जितने चेहरे, उतनी बातें... दरअसल हम सब अपनी- अपनी व्यथा को जीते हैं. काल के गर्भ में पनपते एक आम आदमी के पास ऐसा कुछ भी नहीं होता, जिसे वो अपना कह सके. अगर कुछ अपना होता है तो वो है जुर्रत... हमेशा जिन्दा रहने की, सुकून से जीने और आने वाली पीढ़ी के लिए कुछ जमा करने की.. ऐसे लोग हर वक़्त किसी दोराहे पर पहुँच कर ठिठक जाते हैं. ठगे जाते हैं. मुझे नहीं लगता कि उम्मीदों का सूरज उनके जीवन में कोई पुंज फैला पाता है. आधी जिन्दगी इसी में कट जात्ती है और आधी जिन्दगी का कोई हिसाब बन नहीं पाता.
मुझे वो पूरा मंजर अब भी सामने  दिखता है. घर में सामंती परिपाटी को जीने वाले कई लोग मुझसे कहते कि तुम जो सोचते हो, ऐसा यहाँ नहीं है. तुम अपनी  नेकनीयती अपने पास रखो. पटना में जो करते हो, वही करो. और भी बहुत कुछ.. सुनता. देखता रहता... पटना में जहाँ घर है. मेलजोल के अपने नजरिये से आसपास के बहुत लोग मेरे करीब नहीं आ सके. ऐसा भी कहा जा सकता है कि मै ज्यादा नहीं मिल पाया. हाँ.. ये जरूर हुआ कि आत्मीय होकर जब भी किसी के काम आया तो धारणा बदलते भी देर नहीं लगी. मुझे भी वक़्त-दर- वक़्त किसी की जरूरत हुई तो लोगों ने साथ दिया. आज भी आसपास के बहुत कम लोग जानते हैं कि मीडिया सेक्टर में मै हूँ .. 
     ...... शेष

14 January 2011

पलकों की कतारों में

.. सिर्फ तुमको समेट लेती
छुपा देती
समय से
 जो लौट कर आती
समय की कहानियां
तेरी आँखों के..
साए में
जिन्दा होती
अप्रतिम सा स्पर्श..
मुझे वापस कर दो
सपनों के शोर में
आंच सी बर्फ में
समय की कहानियां
मुझे दे दो...
जहाँ  सिर्फ..
इतना शेष..
कभी निगाहों से
जो सौगात दी..
पलकों की कतारों में
सिर्फ तेरा नाम 
तेरा स्पर्श..
पूरा वजूद
समेट लेती
.. जो लौट कर आती
समय की कहानियां

                                       राहुल

12 January 2011

मेरे सूखे पत्तों में

 
पहले जब तुम
घर के कोने में
मिलते थे..
तुम मेरे नहीं थे..
मै देखती रहती थी
तुम्हें किताबों में.
सूनी-सूनी सी
घर की छतों पर
नींद में तुम..
यदा-कदा तुम दिख
जाते..
आते-जाते
दूर भागते रहते थे..
थमती साँसे..
हवा को समेटने का जतन
बेवस सी होती..
मेरी नींद
तुम हवा में सिमटे..
तो सूखे पत्तों का
मंजर
पानी  पर तेरी-मेरी
किस्मत
किनारे-किनारे
दूर जा चुकी थी..
तुम आ नहीं सके
पर.. मेरे सूखे पत्तों में
तेरी किताबें
तेरी ख़ामोशी
शायद..
मिल जाए..
                                      राहुल

11 January 2011

मुनचुन के मन से.. ३

..... जब मुझे यह लगने लगा कि घर के कई मसलों पर कई लोगों से मेरे मतभेद हैं तो मैंने इसे स्वीकार किया. मुझे यह बात मानने में कोई गुरेज नहीं कि भावना और मिजाज के स्तर पर मेरी कई लोगों से पटती नहीं थी.. यह आज भी है.. दरअसल हम सभी लोग अपने सफ़र की कहानी में खुद रंग भरते हैं. कैनवास खाली हो या बेरंग.. तय हमें करना होता है.. रंग तो आपके आसपास सागर सा फैला है.. साइंस का स्टुडेंट होने के बावजूद मेरे कमरे में हर नामी गिरामी लेखक की बुक्स दिखती.. पढता और डूबता रहता.. उन दिनों सोचता कि किताबें सब कुछ होती है.. मगर ऐसा आज नहीं लगता.. इतने वक़्त में कितना लम्हा गुजर गया.. कितनी पीर सी जिन्दगी समय के लिबास में जमींदोज हो गयी..
१९९५-९६ के बाद तो मामला और संजीदा हो गया.. थोड़ा- बहुत कलम उठने लगा.. जो तबीयत पर गुजरता.. वो शब्दों में ढलता.. बादल.. हवा.. धूप.. पानी और ना जाने क्या- क्या.. आसपास मौजूद रहते. गाँव जाता तो खूब घूमता.. खेतों में काम करते लोगों में शामिल होता तो घर के कई लोग डांट-डपट करते.. लेकिन मैंने कभी परवाह नहीं की.. अपनी मिटटी को समझने की सनक बनी रही.. वो आज भी कायम है.. 

मुनचुन के मन से.. ३                          ...शेष

09 January 2011

ख़त के शब्द..

 
जब कभी आये
अश्कों की चांदनी में
नहाये..
तुम पलट कर
अपने हाथों में
थाम लेना
तड़प  की कशिश..
 मै कल भी मौन थी
गंगा में बहते तेरे
ख़त के शब्द..
और..चित्कार में
बिखरती तेरी हंसी
मै कल भी मौन रहूंगी .
सिर्फ...
इतना वक़्त होता है..
मेरे हाथों में
जब अश्कों की चांदनी में
सौ मौसम रोते हैं
हजारों शब्द डूब जाते हैं
                                             राहुल

07 January 2011

इतने से सवाल में..

सलज नंगे पांव ...
 
जब तुम मिलोगे
चुप से भंवर में
कहोगे..
और चुप से हो जाओगे
मै कहूँगी..
माँ कैसी है
तुम कुछ कह..
खामोश हो जाओगे
मैं घर की दर-ओ- दीवार
का हाल मांगूंगी 
जानती हूँ
जवाब नहीं होगा
मैं फिर कुछ..
कहूँगी
तपती दोपहर में
सलज नंगे पांव
तेरा भटकना
याद है तुम्हें
शायद हाँ..
मै फिर से तुम्हें
कहूँगी
और बताइए..
इतने से सवाल में..
तुम रोज मिलते हो
रोज
देखो..
मेरी तस्वीर में
हाथों से आंसू मत समेटना
जी लेना..
उस धूल को..
जहाँ सब बिखरा है
तेरे नाम से..
माँ के बारे में
सच बताना
मैं जानती हूँ
उनके आँचल के पास
हमेशा लिपटी रही
इतने से सवाल में..
तुम रोज मिलते हो
पर तुम रोज..
चुप हो जाते हो
अनंत काल तक
मैं घर की दर-ओ- दीवार
का हाल मांगूंगी 
                                                       राहुल

06 January 2011

मुनचुन के मन से..2

... स्कूल का सफ़र तय करने के बाद घर में यह बताया जाने लगा कि तुम्हें क्या होना है. जाहिर सी बात है कि अगर आप सब में बड़े हैं तो सब आप पर टूटेंगे. धीरे-धीरे यह लगने लगा कि मुझे हर जगह जिम्मेवारी के साथ दखल देने की आदत सी हो गयी है. कभी सोचता कि कुछ ज्यादा ही बड़ा हो गया हूँ.. मगर पापा हर बार लकीर छोटी कर देते. एक ऐसे परिवार में इतना द्वन्द था कि माँ पूरी तरह हमलोगों को  समर्पित थी और पापा किसी और चीज़ में उलझे रहते थे. पैसों की कदर करना और बचा लेना कोई उनसे सीखता.. समझता. कई मायनों में जिंदगी बेतरतीब थी. शहर की भूल भुलैया और गाँव-जवार की खुरदुरी जिंदगी में हम सब हमेशा झूलते रहे.
मेरे जेहन में हमेशा गाँव..उसके लोग..और न जाने कितने चेहरे कैद रहते. ऐसा कभी नहीं हुआ कि.. मैंने इनको अपने आप से जुदा करने की कोशिश की होगी.. मुझे लगता कि अपनी मिटटी से कट जाना खुद को मिटा देने के जैसा है. ऐसा कभी नहीं लगा नहीं. कॉलेज की दुनिया में घूमते-फिरते घर की दीवार याद आती.. पढना-लिखना यथावत जारी रहा.. रंग-रूप और कद-काठी पर काफी कुछ झेलना पड़ता. कहा जाता कि तुम्हें अपना होश नहीं रहता. कब ख्याल करोगे ? काफी सुना. हर कोई अपने शुभचिंतक होने का दावा करता.. कहानी यही से घूमती गई.
                                                                                                                                  ... शेष  
मुनचुन के मन से.. २

मै तुम में ही मिलूंगा..

  • पलकों में कैद सपनों को मुक्त कर दो.. जिस सोच की कशिश में तुम डूबी हो.. वो न तो हमारा है और न तुम्हारा.. तेरे लम्हे के कतरे में जो निशां बाकी है.. उसमे हम सब समाहित हैं.. अपने-पराये की जो दुहाई तुम बार-बार देती हो..उससे अलग हो जाओ.. ना तो मैंने कुछ दिया है.. और ना हीं तुम्हें अफ़सोस हो कि.. मैंने कुछ दिया नहीं.. जो मंजर तेरी आँखों में गुजरा है.. जो मुस्कान तुम्हारी उस सदी में बिखरेगी.. वही पल हमारा है..मै तुम में ही मिलूंगा..  
                                                                                                                                                                                     राहुल


मुनचुन के मन से..1

ज्यादा वक़्त नहीं गुजरा. कभी- कभी इतना सा दिखता है. हम अपने आसपास न जाने कितने मौसम को बदलते देखते रहते हैं. हजारों नाम.. हजारों चेहरें आपके जेहन में घूमते रहते हैं.
इतना समझता हूँ और महसूस करता हूँ कि आपके न चाहते और न जानते कुछ नाम.. कुछ चेहरे आपको बार-बार जगाते रहते हैं. काफी मुश्किल होता है ऐसे सपने और उसमें जागती हुई तस्वीरों से खुद को जुदा करना.. बहुत दर्द.. बेहद तड़प..
                                                       स्कूल के साथी अभी कहाँ हैं.. भूलते-भागते पलों में जो नाम मुझसे चस्पां रहा. उसकी यादें ही शेष है. स्कूल की आधी दुनिया गाँव में सहेज कर रखी गयी.. बाकी की जिन्दगी शहरों में दफ़न होती गयी.. और हो रही है. घर के लोग मेरे बारे में जो बचपन में कहते थे.. उसी बात को आज भी दोहराते रहते है.. न एक रत्ती ज्यादा और न एक रत्ती कम.. मै मानता हूँ कि यह मेरी सबसे बड़ी जीत है. यह अलग बात है कि अब तक के सफ़र में सब कुछ खोने के अलावा बाकी कोई चीज़ नहीं हासिल कर सका. मुझे बार-बार एक हिंदी फिल्म की एक सटीक लाइन याद आती है. वो इंसान ही क्या.. जो बदल जाए.. अगर इस लाइन को अपनी जिन्दगी में न उतारते तो संभव था बहुत कुछ दुनियावी चीज़ें पा लेता. मगर ऐसा हो ना सका.
                                                                                                                    शेष.......

मुनचुन के मन से..




                           

05 January 2011

बेदर्द हवा के पन्नों पर


इक आग सी मैं पीती हूँ..
 

जब कभी तुम
रोते हो..
मै शोर सी हो जाती  हूँ....
...बेमौत ही मर जाती हूँ
तुम कह भी  नहीं पाते
दूर भी नहीं जाते
मै शोर सी हो जाती  हूँ....
..बेमौत ही मर जाती हूँ
बस यातना को जीती हूँ
इक आग सी मैं पीती हूँ
जब कभी तुम
रोते हो..
मैं देखती रह जाती हूँ ..
बेदर्द हवा के पन्नों पर
तुमको समेटती रहती हूँ
यह बेकार सा जतन होता है
जीने का भ्रम होता है..
जब कभी तुम
रोते हो..
मै शोर सी हो जाती  हूँ....
...बेमौत ही मर जाती हूँ
                                                  राहुल

मेरे घर के दरवाजे..

हवाओं ने.. सजाया होगा

मेरे जैसे होते गए
मेरे घर के दरवाजे.. खिड़कियाँ
आहट किसी के ..
चुपके से आने की
बाट जोहते रहे
मै किताबों में सजा
बेमतलब सा पन्ना
कभी हवाओं ने..
मुझे समेटा.. समझाया होगा
मेरे घर के दरवाजे..
निहारते रहे इस तरह
जैसे..
कोई बेनाम सा आया होगा
उस तरह से
लौटा हुआ थका मंजर
सहमे-सहमे से मेरे कमरें से
हवाओं ने..
मुझे समेटा.. समझाया होगा
                                                        राहुल

03 January 2011

सदी सा गुजरता है..

इतना एहसास भींगता है.....
इतना एहसास भींगता है.....

तेरे हाथों की..
लकीरों में एक नाम सा
दिखता हूँ..
तुम बार-बार.
अपनी किस्मत को
हाथों से मिलाती हो..
जहाँ.. कुछ नहीं दिखता
मेरा नाम धुंधला सा है
मै जानता हूँ कि..
मुझे तलाशने का जतन
तेरे सीने पर सदी
सा गुजरता है..
मै तो सिर्फ
एक लकीर सा हूँ..
मुझे इतना पता है..
 तेरी निगाहों में
जो सदमा पैबस्त है..
उसमें हमदोनों हर पल
डूबते हैं..
इतना एहसास भींगता है
मेरा नाम..
 और
तेरे हाथों की लकीर
बहुत देर से मिले
शायद वही वक़्त होता है..
जब
तेरे हाथों की..
लकीरों में एक नाम सा
दिखता हूँ..
मेरी  धड्कनों में सिमटी हुई
तेरे सीने की सदी
मुझ पर टूटता है
इतना एहसास भींगता है

                                          राहुल