Rahul...

09 January 2011

ख़त के शब्द..

 
जब कभी आये
अश्कों की चांदनी में
नहाये..
तुम पलट कर
अपने हाथों में
थाम लेना
तड़प  की कशिश..
 मै कल भी मौन थी
गंगा में बहते तेरे
ख़त के शब्द..
और..चित्कार में
बिखरती तेरी हंसी
मै कल भी मौन रहूंगी .
सिर्फ...
इतना वक़्त होता है..
मेरे हाथों में
जब अश्कों की चांदनी में
सौ मौसम रोते हैं
हजारों शब्द डूब जाते हैं
                                             राहुल

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