Rahul...

06 April 2011

मुक्त कर सको तो...

मुझे सवालों के घेरे में
रहने को कहा गया..
जो भी कुछ मेरा छीन गया
कैसे कुछ स्पर्श..
चुपके से..
अलफ़ाज़ बनते-बनते
कही खो सा गया..
मुझे सवालों के घेरे में
रहने को कहा गया........
कितनी सी बिखरती
स्याह हसरतें
ओ... अभी पलकों पर जो शेष है
तेरे चेहरों की शिकन
में जो पल गुजरता गया...
उसे बस.. एक बार
हाँ.. इतना ही कह रही हूँ
दे देना..
..गर कही मेरे आँचल का कोना 
तुम्हे दिखे..
इतना सा सवाल.
और अब होने-न-होने के  फासले
मुक्त कर सको तो...
दे देना.....
                                      राहुल


3 comments:

  1. कल 24/04/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल (विभा रानी श्रीवास्तव जी की प्रस्तुति में) पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  2. स्याह हसरतें सवालों के घेरे में भी कहाँ कैद होती हैं...? अच्छा लगता है आपको पढ़ना..

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