Rahul...

19 June 2012

रात.. अब तुम जाओ

कहाँ  से आती है
रातें ?
कहाँ से रिसता है
उम्मीद ?
 एक रात
एक उम्मीद
दोनों के बीच
खड़ा
कच्ची धूप का फासला
रात कहती है
इन धूपों को पकने दो
सहर होने तक...
जब सब जाग जायेंगे
हम...
उसी फासले में
मिटकर एक तो हो जायेंगे

उम्मीद कहता है
आओ...
निर्वाण को...
तलाशे
तेरे छिलते मन में
जब मेरा अंश
साकार होगा..
हम फिर से..
वैसे ही काँटों का
एक बुत बनायेंगे
मुझे अब भी
यकीन है तुम पर..
जब पिछली बार
तुमने...
अपने सीने में
छुपाकर
काँटों में पिरोया था...
फिर से..
मुझे उसी शक्ल में
ला दो...
तुम्हारी पकती हुई
कच्ची धूप में
ख्वाब की पंखुरियां
गुनगुनाने वाली है..

 मै तो वैसा ही ...रहूँगा
काँटों में भी...
रात.. अब तुम जाओ
सहर  की बेला
आसपास बिखरनेवाली है....
हमे तो
तुम्हारे हर अंश में
कितनों  के प्रारब्ध को
 जीना है..

                                             राहुल........

12 June 2012

सवालों के सामने-३


...बातें कहाँ से शुरू हुई ...और कहाँ पर विराम लेने लगी...अभी तक के अल्प सफ़र में उपलब्धियां नाम मात्र की रही है... अपने मनोभावों को शब्दों में पिरोने की आदत कब लगी... कुछ ख्याल नहीं... जब ब्लॉग के बारे नहीं जानता था..  तब इधर-उधर लिखकर छोड़ दिया करता था.. जाने-अनजाने लोगों ने उसे सहेजा.... मेरे लिए...
... वर्ड वेरिफिकेशन....कमेंट्स......पोस्ट.....वीणा स्टूडियो....उसकी .निर्विकार... यथावत तस्वीर.. दार्जीलिंग के तिब्बती शरणार्थी कैंप का रंग.... इन सबके बीच एक सच्चा इंसान... मेरे अन्दर हमेशा मौजूद रहेगा...इस छोटी सी कायनात में ललक इस बात की भी नहीं कि कभी उनके आमने-सामने होंगे कि नहीं..... हाँ जब कभी हमारा बेरहम वक़्त इसकी इजाजत देगा... तो अपना लैपटॉप सामने रख देंगे......
                                                                                                                               
                                                                                                                      राहुल

सवालों के सामने -2



....हमें अभी भी नहीं मालूम कि मेरे ब्लॉग से वर्ड वेरिफिकेशन हटा कि नहीं... आज हम उस इंसान को इसीलिए याद कर रहे हैं कि उन्होंने काफी खूबसूरत पोस्ट लिखा. हर विधा में, हर शैली में.. एक नहीं...दो नहीं, बल्कि कई बार... उनके शब्दों ने हमें संबल दिया... मेरी कविता और उनके कमेंट्स को लेकर एक और बात हुई... हमें इतना तो पता था कि उस सच्चे इंसान को हमने आहत किया है....बाद के दिनों में जब एक दिन ब्लॉग का पिछला पन्ना पलट रहे थे...तो  कुछ पुराने पोस्ट पर उनका कमेंट्स दिखा... बेहद ही सारगर्भित और सच्चा.... यकीन नहीं हुआ कि ऐसा भी हो सकता है... करीब साल भर पुराने पोस्ट पर कमेंट्स देना... हमारे लिए अनमोल धरोहर है...वो हमेशा मेरे पास रहेगा....और तो कुछ नहीं बचता है हमलोगों के लिए..  वैसे हम कोई आदतन कवि या लेखक तो नहीं थे, एक अदना सा पत्रकार (जो अभी तक अपने आप की तलाश नहीं कर सका है..) ख़बरों की खोज में कितना कुछ खोते गए... और अब तो ये सोचने का वक़्त भी नहीं कि कुछ बचा भी है या सब शेष हो गया.. पटना में पत्रकारिता की क्या दशा-दुर्दशा है... हमने इसे लगभग १२ सालों में खूब समझा है... ख़बरों को कवर करने के नाम पर.. अखबार के नाम पर  धौंसपट्टी दिखाकर दलाली करना... और ऑफिस के भीतर बड़े पदों पर बैठे दिग्गज नाम और उनका कर्म.... बताने की जरुरत नहीं... आप इतना ही समझ लीजिये कि दुनिया के सबसे पुराने पेशे और इसमें कोई ज्यादा अंतर नहीं रह गया है... अगर सिर्फ कंटेंट कि बात करें तो वो हमसे ज्यादा बेहतर हैं... सच को खुल कर स्वीकार तो करते हैं... खैर....
फिर एक बार राष्ट्रीय सहारा का जिक्र करना चाहेंगे... ठीक बोरिंग रोड चौराहा पर इसका ऑफिस है.. चौराहा से पूर्व की तरफ जाने पर एक फोटो स्टूडियो है.. वीणा स्टूडियो...आप सोच रहे होंगे कि ये स्टूडियो बीच में कहाँ से आ गया .. तो एक बार जरुरी काम से हम वहां गए... वहाँ काम चलता रहा और हम चुपचाप तमाशा देखते रहे... दरअसल उस स्टूडियो का काफी नाम है.. शादी-ब्याह के लिए लड़कियों की तस्वीर यहाँ निराले तरीके से तैयार की जाती है.. और उससे भी ज्यादा दिलचस्प होता है फोटोग्राफर महाशय का तस्वीर उतारने का बेलौस अंदाज.. कुछ ऐसे ही काम से हम वहां थे और सब कुछ बाहर में खड़े होकर देख रहे थे... स्टूडियो के बाहर एक छोटा सा गार्डेन भी है.. आप अपनी पसंद के मुताबिक कहीं भी बैठ जाइए और..फ्रेम तैयार......फोटोग्राफर महाशय जितनी बार कैमरा क्लिक करते, उससे कहीं ज्यादा हंसने और मुस्कराने की बात दोहराते... सजी-धजी लड़कियां चुपचाप कभी बैठ जाती तो कभी खड़ी हो जाती (किसी भी लड़की के लिए नए जीवन में कदम रखने का ये उम्मीदों भरा शगुन होता है.......ओह... रे मन.. कब तक... कितने सपने....) और फोटोग्राफर महाशय कैमरा क्लिक करने के साथ.. हँसते रहिए.. मुस्कराते रहिये .... कहते जाते... ये पूरा नजारा आज भी मेरी आँखों के सामने जी उठा है....
उसी स्टूडियो की एक तस्वीर (बहुत हद तक यकीन के साथ कह रहे हैं ) ...उसका फ्रेम... बहुत कुछ याद दिला देता है... इतने सालों में कितना कुछ बदल गया... दिन अब दिन न  रहा.. रातें राख में मिल गयी ... जहाँ बात के बात में विचार बदलते गए और रातों रात इतिहास बदल गए... वहां हमारे-आपके बदलने में कितना वक़्त लगेगा ? लेकिन नहीं बदली तो वो तस्वीर...निर्विकार... यथावत...... जो उसी वीणा स्टूडियो की है (बहुत हद तक यकीन के साथ कह रहे हैं )...
आज से करीब दो महीना पहले यानि १९ मार्च को ऑफिस के काम से दार्जिलिंग जाने का मौका मिला... एक ही दिन में लौटना था.. काम ख़त्म होने के बाद थोड़ा घूमने निकले ... दार्जीलिंग में एक जगह तिब्बती शरणार्थी कैंप और सेंटर है.. वहां भी गए.. तिब्बत की आजादी के संघर्ष और बलिदान की पूरी गाथा आप यहाँ देख सकते हैं.. कैंप में घूमने के दौरान हस्तनिर्मित सामान को देखकर काफी हैरत हुई... जाहिर है सब कुछ सुन्दर तरीके से हाथों से बना हुआ था.. फिर एक सामान पर नजर पड़ी... यकीन नहीं हुआ... वीणा स्टूडियो की उस निर्विकार... यथावत तस्वीर का रंग उसमे पूरी तरह समाहित था... बहुत देर तक रंगों से बात होती रही...लेकिन  सब कुछ मौन और.....दिव्य.....                                            
            
                                                                                                        राहुल






01 June 2012

सवालों के सामने.....




कहाँ से शुरू किया जाए ? ... सवाल इतना ही नहीं है ? कई बार हमें लगा कि कुछ सवालों को चुपचाप सहेज कर रख दिया जाए.. कई बार लगा कि इस पर क्या जवाब दिया जाए? इसी कशमकश में कुछ सवालों को जिन्दा रखा.. सोचा... जब कभी अपने लिए वक़्त मिलेगा... तो उन सवालों के आमने-सामने बैठेंगे. करीब एक साल से हम घुमक्कड़ बन कर अपने घर-शहर से दूर होते गए.. लेकिन एक दो शब्द लगातार मेरे पीछे चिपका रहा. ब्लॉग लिखने की शुरुआत से लेकर अब तक की यात्रा में हमने कोई  चमत्कार नहीं किया. मेरे जैसे हजारों लोग रोज न जाने कितने लिख-लिख कर पन्ने भरते रहते हैं.. उसी में हम भी थोड़ी जोर-आजमाइश कर लिया करते हैं.
ब्लॉग लिखने की हमारी कहानी थोड़ी अजीब है. जहाँ तक मुझे याद रहा है कि जब हम राष्ट्रीय सहारा, पटना (२००८ ) में चीफ रिपोर्टर थे तो कुछ जरुरी काम से देहरादून जाना हुआ. दो-तीन दिनों तक वहां रहने और घूमने के बाद एक दिन के लिए मसूरी गया. फिर उसी दिन दून वापस लौटकर दिल्ली के लिए बस पकड़ ली. सुबह पहुँचने के बाद अपने एक ममेरे भाई के डेरे पर गया. बस.. वहीँ से इसकी शुरुआत हो गयी. उसने मुझे बताया कि भैया.. आप तो लिखते हैं ?.. हमने कहा.. थोड़ा सा... उसने फिर कहा... मेरी बात मानिये... आप अपना ब्लॉग बनाइये.और लिखिए.. हमने कहा.. ये कैसे होगा ? हम तो ब्लॉग का नाम सुने हैं, पर कुछ जानते नहीं.. तब उसने तुरंत अपना पीसी ऑन किया और सब कुछ समझाने लगा. उसने लगभग दस से पंद्रह मिनट में मेरा ब्लॉग तैयार कर दिया.. खैर.. जब पटना लौट कर आये तो ऑफिस में थोड़ा-थोड़ा उस पर लिखने लगा. वैसे भी फुरसत मिलती नहीं थी. फिर भी कुछ-कुछ समय निकाल कर लिख लेता. बाद के दिनों में जब मैंने सहारा की नौकरी छोड़ दी तो कुछ दिनों के लिए लिखना बंद हो गया. सहारा की सरकारी जैसी  नौकरी छोड़ने को लेकर मेरे दोस्तों और घरवालों को काफी हैरानी हुई. सब नाराज थे.. अपने घर की नौकरी छोड़ दी ? लगातार सात सालों तक हिंदुस्तान मुजफ्फरपुर में रहने के बाद घर वापसी हुई थी. ये क्या कर बैठे? और भी न जाने बहुत कुछ...... हमने कुछ जवाब नहीं दिया.. कुछ दिनों तक इधर-उधर भटकने के बाद एक छोटे से चैनल में गए.. हालांकि अब कहीं भी काम करने का मन नहीं कर रहा था, पर कुछ लोगों के लिए.. उनके चेहरे पर मुस्कान बनी रहे (दुनियादारी के लिहाज से आप कुछ लोगों के लिए सीधे जिम्मेवार होते हैं) .. मैंने वहाँ काम शुरू किया.
खैर... बात हो रही थी ब्लॉग लिखने की. लेकिन वो पुराना ब्लॉग बंद हो चुका था. फिर से नयी शुरुआत हुई.. थोड़ा-थोड़ा लिखना शुरू किया. हम इस बात को ईमानदारी से स्वीकार करते हैं कि इस मामले में तकनीकी रूप से हम ज्यादा कुछ नहीं जानते थे और आज भी नहीं जानते हैं. सिर्फ तस्वीर और टेक्स्ट को कैसे अपलोड किया जाता है ? बाकी बहुत कुछ नहीं मालूम.. कुछ लोगों ने मेरे पोस्ट पर कमेन्ट्स देना शुरू किया. जाहिर है अच्छा लगता.. थोड़ा हौसला बढ़ता.. इसी बीच एक-दो लोगों ने मुझसे कमेंट्स देने के साथ ये कहा कि.. आप वर्ड वेरिफिकेशन हटा दें..कमेंट्स देने में आसानी होती है.... इस पर मैंने ध्यान नहीं दिया.. सोचा.. बाद में देखेंगे.... बहरहाल... लिखते रहे और कमेंट्स आते रहे.. लेकिन ज्यादा नहीं .. बस दो-तीन ही... हर बार इस सलाह के साथ कि... आप वर्ड वेरिफिकेशन हटा दें.. हमने एकाध बार कोशिश भी की. मगर समझ नहीं पाया और छोड़ दिया.. मुझे अब अपने आप पर शर्मिंदगी होने लगी... पर  वर्ड वेरिफिकेशन नहीं हटा सका.
फिर चैनल की नौकरी छोड़ने के बाद हम वहीँ आ गए, जहाँ हम जैसे लोगों का ठिकाना होता है.. तब थोड़े दिनों के लिए फिर लिखना छूट गया... अब एक बार फिर से हम वहीँ खड़े थे... जहाँ आज से दस साल पहले थे.. घर से बाहर...घर की तलाश.. उम्मीदों की तलाश.. उसी मुस्कान को फिर से वापस लाने की तलाश.. जिसके लिए आप सीधे जिम्मेवार होते हैं... नयी यात्रा शुरू हुई..........................
जब कोलकाता आये तो नए शिरे से सब कुछ शुरू हुआ. सब कुछ बदला हुआ.. यहाँ थोड़ा समय मिलता तो लिख लिया करते. कमेंट्स आते और फिर से सलाह ... कृपया आप वर्ड वेरिफिकेशन हटा दें. अभी तक आपने हटाया नहीं.. ओह... अब हम करे तो क्या करें ? इसी बीच उन्होंने लगातार मेरे पोस्ट पर कमेंट्स दिया.. मुझे सराहा... अंत में उन्होंने वर्ड वेरिफिकेशन हटाने का पूरा प्रोसेस समझाया.. लिखकर.... मैंने फिर कोशिश की.. नहीं हुआ.. रिप्लाई में हमने लिखा... मैं सच कहता हूँ.. पूरी कोशिश की, पर हुआ नहीं..हालाकि उनके कमेंट्स लगातार आते रहे.. कुछ दिनों के बाद उन्होंने एक पोस्ट पर कमेंट्स दिया.... अब मै आपको कभी नहीं........ वर्ड वेरिफिकेशन को.. वैसे आपने अच्छा लिखा है...|  तब से लेकर आज तक ये अपराध बोध मेरे मन पर पैबस्त है.. सोचते हैं... हम एक ऐसे इंसान की बात को पूरा नहीं कर सके.. जिसने हमेशा मेरे शब्दों, जज्बातों और  भावनाओं पर सच्चे मन से शब्द दिए... हम कभी नहीं सोचते थे कि कोई इस तरह से संज्ञान लेगा...क्या हम इस लायक थे.... कोई लगातार एक साल से ज्यादा तक वर्ड वेरिफिकेशन हटाने को कहता रहा और हम कुछ नहीं कर सके....
                                                                                                                                 अभी और भी......






28 May 2012

फिर से...

फिर से..
रात तेरे क़दमों में 
कुछ पल के लिए 
आएगी ...
सब एकमत सस्वर 
गुनगुनाएंगे 
मंगल गान...
हम भी तो होंगे ना ?
फिर से...
दूब की कोपलें 
स्नेह्शिक्त आँगन से 
निकल..
तुम्हारे आँचल में 
सिमटी सी होगी 
हम भी तो होंगे ना ?
फिर से..
शाम की घूंघट में 
पिघलता शोर 
तुम्हें सुनाई देगा..
हम भी तो होंगे ना ?
 निरुदेश्य...
स्थिर प्रज्ञ...
फिर से...
आसमान से बरसती 
चटक किरणों में 
हम आयेंगे  
मंगल गान बनकर....
                                       राहुल 
 


24 April 2012

ऐ मेरे मालिक.....

ऐ मेरे मालिक.....
मुझे रास्ता दिखा
थोड़ी रोशनी दे
मेरे सफ़र को
अपना सा दामन दे..

ऐ मेरे मालिक.....
मै कदम बढ़ा सकूं
खुद का ख्याल मिटा सकूं
अपने करीब 
तिनके सा आसरा दे.....

ऐ मेरे मालिक......
मेरे अश्क के सहरा को
थोड़ी बारिश दे
थकी आँखों को 
पत्थर सा हौसला दे...
                                            राहुल      

09 April 2012

आग पर....

तेरी मेहरबानियों पर 
रोती बहारें
जब दबे पाँव
झुलसते..
आग पर चलती है 
रतजगा करती है 
..तो  हम 
अपनी ही जंजीरों के 
मोहपाश में 
लिपटे
तुम्हारी मुस्कराहटों 
की सेज पर
लहूलुहान होते हैं..
थकी थमी..
बेजार होती सड़कें 
मेरे सीने पर 
उन्हीं जंजीरों को 
कसते हुए
नींद की खुशफहमी में ..
आग पर चलती है 
रतजगा करती है...
 तब भी.. 
हम उसी सेज पर
लहूलुहान होते हैं..
तेरी मेहरबानियों 
की बहारें..
मेरे ही कटघरे में 
मुझे कैद करती है...
दलीलें सुनती है 
भूल कर..
न भूलने जैसा..
रोज बदल कर .
न बदलने जैसी 
सजा मुक़र्रर करती है 
तब...
प्रसव की वेदना जीता
मेरा अबोध शब्द
बेकल.. अजन्मा 
निरुत्तर होता है
                                            राहुल

04 April 2012

फैसलों की किताबों में


कभी मेरे..
झूमते बालों में
तुमने एक स्पंदन
रोपा था...
कभी मेरी..
तारीखों में
तुमने..
पानी के बुलबुले को
हाथों में
सहेजा था..
अभी भी
मेरी उलझी लकीरों को
तेरी गवाही की दरकार है.
तुमने तो मसीहा होकर
जिन्दा रहने..
की सजा तय की..
जीते रहे
तो ..जीते रहे
किताबों-किस्सों के
ढेर पर..
तेरा स्पंदन तलाशती हूँ

तेरे बुलबुले को
पन्नों से निकाल
माथे से लगाती हूँ
कभी माँ भी कह देती है
मन को जलाकर
आगे पांव रखना
अब स्पंदन को जाने दो....
हर बुलबुले का
अपना फैसला है
उन्हें उड़ जाने दो...
मै मूक सी...
हवा सी उदिग्न
फैसलों की किताबों में 
तेरा स्पंदन तलाशती हूँ
शायद..और लगभग
शायद .. अब भी
मेरी उलझी लकीरों को
तेरी गवाही की दरकार है.........
                                                                              राहुल 




24 March 2012

जो दुपट्टा ख़रीदा है ..

सिमटी..सहमी
बातों की पोटली लिए
हम कारवां होते गए
शब्दें राह चलती गयी
नहीं था नाम सड़कों का
मकानों से भी
गायब थी तख्तियां
तेरे लिए
जो दुपट्टा ख़रीदा है ..
सिमटी.. सहमी
बातों की पोटली में
कसमसाती रही धूप
उस दुपट्टा छूने को
बस कोई..
शब्द पीछे रह गया
गायब तख्त्तियों वाले
अनसुने मकानों में
पड़ाव डाले शब्द
जागते रहे
बस कोई...
आलिंगन चुभती रही
तेरे दुपट्टे को..
हमने जस का तस
रख छोड़ा है..
सजिल्द..और
उमस से बचाकर
शब्दें राह चलती गयी  
हम तो कारवां होते गए

                                                    राहुल

07 March 2012

कुछ सच्चे रंग

तेरे-मेरे
कुछ कच्चे रंग
अधूरा सा ...
अबोध सा...
हाथों में
सना हुआ
रात में
गुनता हुआ
भोर की किताब में
भूला सा...
भटका सा..
तेरे मेरे
कुछ कच्चे रंग
चिट्ठी के अधरों पर
बिना पते का
बेनाम सा
आँगन की मिट्टी में
चूल्हे की फरियाद सा
कच्चे-पके
आंच सा
तेरे-मेरे
कुछ सच्चे रंग

.......................राहुल



18 February 2012

मेरी राख में ढल जाओगे

सिर्फ तेरे..
शब्दों में होती हूँ
मनमुक्त गगन में
जीती हूँ........
बात टूटी बातों का
साथ अधूरी रातों का
तेरी कायनात में
रोज ढलती हूँ..
मनमुक्त गगन में
जीती हूँ........
मौन दरिया आँखों का
किस्सा खालिश किस्सा हूँ
तुम मानो..या
फिर ना मानो
पूरा तेरा हिस्सा हूँ
बस..कही नहीं
मै होती हूँ.. 
मनमुक्त गगन में
जीती हूँ........
अलग कहाँ हो पाओगे
क्या..सच में जी पाओगे
मेरी राख में ढल जाओगे
तेरी उमस में
पिघलती हूँ..
मनमुक्त गगन में
जीती हूँ........

                                                                      राहुल ...

  

08 February 2012

....जब नज्में तुम्हारी

कई बार...
जागते-जागते 
जब नज्में तुम्हारी 
जुदा हो जाती है..
खुद तुम से...
गीली- गीली उदासियाँ
और... 
मुक्त होने की याचना 
उसी फरियाद की तरह 
मुझसे आकर मिलती है..
जहाँ कहानियाँ..
तुम्हारी नज्मों में 
ढलने को बेताब
हाथ जोड़े...
मुझसे विनती करती है 
नज्में तुम्हारी 
हमारी आह से..
चुपचाप..
मेरी कहानियों का 
पन्ना...चुराती हुई
गायब हो जाती है
मैंने कहीं सुना था 
किसी दरिया के समंदर में 
मिलने तक...
नज्म जिन्दा रहती है  
सच ही सुना था 
तुम.. तुम्हारी नज्में 
मेरी शापित कहानियों को 
 छोड़कर... 
कैनवास फिर भी...
दीवार पर टंगी रह जाती है..
जब नज्में तुम्हारी 
जुदा हो जाती है..
खुद तुम से...
                                  

06 February 2012

धुआंती आँखों को

-->
दुःख सबकी नहीं होती
इसकी गलबहियां सब से
नहीं जमती
आदि कथा में
डगमगाते क़दमों
को थामते
गिरकर उठने
और....
फिर से गिरने का दुःख
धुआंती आँखों को 
सोखते  माँ के आँचल में ... 
बंधा खाली लिफाफा 
 हर बार बैरंग आसरे
..को गले लगाती 
 अपने हिस्से का दुःख......
दरकते आइनों से 
तरुणाई को नापती
सरपट भागती बेटी...
कांपती आँखों में
अनमने अंदेशे को जीते 
पिता की आँखों का दुःख
चूल्हे की बुझती राखें 
 
फिर से...
गमजदा होते भूखे बर्तन 
इतने के वाबजूद
जब बीते खड़े पहाड़ 
हर रात सामने आते हैं 
बिना बताये...
कई बार सच में 
इसकी गलबहियां
सबसे नहीं जमती
दुःख तो हमारी माएं जीती है
दुःख तो हमारी माएं सीती हैं 
उसी आँचल में
जिसमे बंधा होता है
धुआंती आँखों को
सोखता..
बंधा खाली लिफाफा

                                                            राहुल.......


31 January 2012

बाकी सब कुछ..

कितने फासलों में
रात
हमारे बीच के शब्दों
में फंदे सा..
झूलती..टंगी होती है
किसी बच्चे के पालने में

लटकी ..
आँखों को टिकाये
रखने जैसे खिलौने
ठीक वहीँ से
हम दोनों
या .. हम दोनों जैसे
बहुत सारे कितने
सलीब को बड़े जतन से
उठाते हैं
ठीक... उतने ही फासलों में ..
रात.. जार-जार रोती है
फिर तब.....
हम दोनों
या .. हम दोनों जैसे
बहुत सारे कितने
भोर को दुलारते..
सूत्रधार की याचना मांगते
वहीँ आकर अलग हो जाते हैं..
मंच वैसा ही
 चेहरा भी
 अनवरत.. सा

कितने फासलों में
रात
हमारे बीच के शब्दों
में फंदे सा..
झूलती..टंगी होती है
बस...
इसका बही खाता
नहीं होता
बाकी सब कुछ..
बच्चे.. पालने
और उनके लटकते खिलौने
...                                                          राहुल

28 January 2012

नासमझ मन

अनाम मौसम सा
तेरा नाम
उमड़ते बादलों सा
तेरा चेहरा
कुछ पत्तियों के
आँख खुलने जैसी
तुम्हारी बातें...
अधखुली..अनकही 
रोज बदलती तारीखों में
कोई एक दिन सा
अब भी होता है
मेरा दिन..
किश्तों में आते-जाते
बेपरवाह मौसम
 नहीं जानते
आसपास.
तुम नही..

कभी नहीं..
रोज बदलती तारीखों में
बेमौसम
बरसती..
गुनगुनाती धूप
 इतने कालचक्र को जीते
कहानियों में
नासमझ मन
जैसा होता है
अब भी मेरा बसंत..
                                                     राहुल






24 January 2012

खुद पर रोते-हंसते

दिन के कई हिस्सों में 
 बंटते हुए ..
 खुद पर रोते-हंसते 
रात जब मेरे घर में..
आती है..
मै तेरी ही कहानियों 
किस्सों में खुद को 
दफना देता हूँ..
ये सोचकर..
ये मानकर..
तुम फिर कहोगी 
नींद से जागकर 
करीब आकर ..
अपने सिरहाने 
मुद्दत से 
जो कुछ छिपाए बैठी हो..
उसे मेरे हाथों पर 
देते हुए ..
मौन हो जाओगी
पर तुम सोचोंगी ....
अब कुछ नहीं
कभी नहीं.. 
दिन...रात के दरम्यान 
सीने में उगते काँटों की..
वंशबेल...
रिवाजों की..
लिबास में नग्न दिखती 
मान्यताएं..
इन्हीं कुछ घंटों से 
वर्षों तक कितनी सदियाँ 
मेरे क़दमों में भंवर सा 
लोटती है 
मै दिन-रात 
कई बार..
कई हिस्सों में 
ना तो अब ख्वाब बुनता हूँ 
और ना ही..
तुम्हें जी पाता हूँ 
सच ये है कि
मै बार-बार
कितने हिस्सों में 
टूट जाता हूँ....

                                                   राहुल ...

21 January 2012

हर रोज.. हर लम्हा..



किस-किस मोड़ पर
मिल जाते हो..
हर रोज...
हर लम्हा...
कभी उनींदी आँखों से
तड़पते..कांपते
पवित्र स्पर्श को
सजाने लगती हूँ
तुम्हारे ही आसपास...
न जाने कितने..
गुलाब..काँटों की चुभन
और..
तेरा-मेरा हर रोज..
हर लम्हे में मिल जाना..
कितनी चीखें..
तेरे पवित्र स्पर्श
को कहाँ छुपा दूं
मै बुत सी होकर बस इतना ही..
तो मांगती हूँ..
सच... मगर
यकीन नहीं..
तुम इतना सा
देने की जिद में
किस-किस मोड़ पर
मिल जाते हो..
हर रोज...
हर लम्हा...
            हर रोज.. हर लम्हा..                              राहुल

10 January 2012

तुम कहते थे ना....


कैप्शन जोड़ें
 मीठी सी तन्हाई में ...
मेरे पास छोड़ जाते हो
कुछ गुमसुम सा सवाल
मै सोचती हूँ
तुम्हें क्या जवाब दूं..
क्या जवाब देना चाहिए...
मुझे याद आता है
तुम्हारा वो अंतहीन फासला
तुमने अचानक रोप दिया
मेरे सीने में...
मै हर बार तेरे लिए...
एक सवाल ही तो जीती हूँ
न जाने कब से ..
तुम आज भी...
अनमने से उदास जंगल को
शाप क्यों देते हो...
वो तो सिर्फ शरीक था..
अपनी असहाय सी
अनसुलझी गाथा का
तुम कहते थे ना....
मेरी टूट चूकी साँसों...
की दरख्तों में भी
मिल जाएगा जन्नत के निशां..
तुम कहते थे ना...
उसी अंतहीन फासले के
कतरे को जी लेना
सच तुमने कितनी
मासूम सी सजा
तय की है
मेरे लिए....
                                                                      राहुल

04 January 2012

मन पत्थर सा..

 
चाँद जो कभी आता है 
मेरे आसपास ...
घर के कोने में तुम्हारे
आने की आहट
आँख चुराती हुई
चुपके से जा बैठती है
अजनबी ख्वाब की डोर पर
मन पत्थर सा..
तेरे आगे अपलक है...
तुमने मेरी सदी के पन्नों पर
न लौटने के वादे किये थे....
कांच की बंदिश में
एकबारगी..एक सांस में 
चूर कर देती हो..
शब्दों को
जो पल अपना साँझा था...
एक पल में हमसे बाँट लिया
नहीं रहा अपना कुछ भी
बेनाम सपनों को चुराए 
सुबह का बेसुध पन्ना ..
समेट लेती हो...अपने साथ
तपती रात को अकेले
जीने के लिए...
हमने कभी याद दिलाया था
सदी के उसी पन्नों को
हाथों पर रखकर..
...अगर मिल गए
तेरे अजन्मे ख्वाब की डगर पर
तो मान लेना....
हजारों रातें...मुद्दतों और...
सौ जन्मों के फासले में
मिटते-मिटाते...
टूटते तारों की तरह
आ मिलेंगे
तेरे ही आँगन में...
                                             राहुल...





30 December 2011

रात कहीं तनहा

 
नहीं था साकार होना..
उम्मीदों के दीए...
तुम कल जब चले जाओगे..
तपते सफ़र में
कुछ तो निशाँ छोड़ जाओगे
मेरा तो सब कुछ...
इतना सा मद्धिम है
रात कहीं तनहा
चुपके से गुजर जाएगी
न तो ये पल आएगा..
और न ही कभी तुम
पर इतना ही संतोष लेकर
दुनिया कुछ हाथ पर रख जाएगी
और फिर ये तस्वीर कभी नजर
नहीं आएगी .......................................