Rahul...

29 December 2011

जाते-जाते -4

.... अब नहीं लगता कि तुम्हारे बदलते चेहरे और करवट लेते इस साल के बीच कोई फासला बाकी रह गया हो. चलो माना कि मै कहीं नहीं था. सच में मै कहीं से तेरे आसपास होना भी नहीं चाहता था. रात के गहरे अंधकार में कोई गुमनाम सी किरण जैसे भटकती रहती हो.. सुनसान पगडंडियों में बार-बार रास्ते से भटकने जैसा.... अपने रास्तों में कहीं भी ठहराव जैसी चीज नहीं रही.. हाँ अगर कुछ रहा तो इतना कि कोई उम्मीद का दामन दूसरों के हवाले न कर दें... यह हमेशा मन के आसपास रहा..... और जब अंतहीन कथा यात्रा में कोई साथ हुआ तो मैंने सब कुछ सौंप दिया... मेरे साथ यह एक दिक्कत है..यहाँ से वो यात्रा शुरू हुई ..जिसका कोई मकसद नहीं था. मुझे हमेशा ये चीज अखरती कि किसी को बार-बार गलत समझा जाता रहा.. दुनिया को समझाने और सिखाने को हम प्रारब्ध नही नहीं थे. वर्ष के चढ़ते और ढलते वक़्त में एक मुद्दत का फासला दीखता है. कितना कुछ खोने का... हम तो पहले से इतने खुशनसीब थे कि खोने की रवायत को कभी मिटने नहीं दिया. शायद ऐसी खुशनसीबी सबको कहाँ मिलती है...... आज भी इतना कुछ अंतर्मन में शेष है ..... हम तो आदतन सब के liye एकला चलो रे... का संताप जीते हैं...इसी दम पर तो गर्व करने लायक कुछ मर्म अपनी झोली में अब तक है..... पर कुछ लोग अपने लिए अफ़सोस है..... कहकर सिमट जाते हैं... क्या कहना ? इतना ही तो तुमसे हो सकता था.... और तुमने इतना ही किया... तुम्हे अपने लिए हर मोड़ पर एक सिस्टम की दरकार होती रही.. हर चीज अपने लिए ... और जब किसी और का वक़्त आया तो फिर अफ़सोस जैसा शब्द.... अब से कुछ घंटों बाद न तो ये साल रहेगा और न ये अंतर्द्वन्द... सब उन्मुक्त हो जायेंगे... सब उस रौशनी में डूब जायेंगे जो कभी हमारे लिए नहीं था...............................
                                                              राहुल




27 December 2011

जाते-जाते- 3

पहली बार ऐसा ही हुआ. लगा जैसे आप कभी सिर्फ अपने में निमग्न नहीं हो सकते. कई लम्हा ऐसा है जो सिर्फ आपको डूबों सकता है. इतना तो नहीं जानता था कि जब वो पल आने वाला था तो सब कुछ बस यूं ही था. आज कुछ महीनों के बीतने के बाद जिस मुकाम पर खड़ा हूँ.. सब सपनों सा अदृश्य होता जा रहा है. अपनी नादानियों कि वजह से कितनों को तकलीफ दी... कई वाकई नाराज हुए. यहाँ यह कहना ज्यादा ठीक होगा कि कोई गहरे अन्दर तक इतना आ गया कि सब मुझ पे टूट गए. क्या करते ? हमने अपनी आवाज को कभी मरने का मौका नहीं दिया. क्या फर्क पड़ता है... आख़िरकार कई लोग इतना ही समझे कि कुछ मामला है. आप अंदाज नहीं लगा सकते कि हर आदमी कैसे बेपर्द होकर सब कुछ कहने सुनने लगा. सामने जो आप तस्वीर देख रहे हैं... यह एकदम हमारी कहानी कहने जैसा आवरण में घिरा है. रंग तो उसके चारों तरफ बिखरा है.. पर खुद के हालात पर एक कतरा तक नहीं. मैंने हमेशा उस सिस्टम को तोड़ दिया जो कैदखाने से ज्यादा कुछ नहीं होता. क्या किसी को अपने अंतर्मन में छुपा लेना अपराध है ?  कैसे न करते अपराध..... ये सच है कि इसकी सजा आजीवन मुझे मिलती रहेगी. मुझे हमेशा ये मंजूर रहेगा..
                                            अभी और.... राहुल

24 December 2011

जाते-जाते

 
... हम शायद कभी  उनके बारे में नहीं सोचते.. जो सच में आपकी ओर उम्मीद भरी निगाहों से टकटकी लगाये रहते हैं... खुद के आसमान को हमने इतना फलक नहीं दिया, सदा अपने खोल में दुबके रहे.. इस डर से कि कुछ अनर्थ हो जायेगा.. यहीं चुक हो जाती है... खैर ऐसा तो सरेआम हो ही जाता है..
कुछ करीब रहनेवाले लोगों को एक चीज काफी नागवार लगा. इरादा ऐसा नहीं था. एकदम नहीं..... अचानक किसी को याद करते हुए इन  सब बातों से काफी चोट पहुंचती है.. पर यहाँ कहना शर्तिया जरुरी है... मै और  मेरे जैसे लोग अंतर्मन की आवाज को ख़ामोशी के अल्फाज में कहना जानते हैं.. अपने चित्त के आसपास रखने की मेरी छोटी सी अर्जी पर इतना बुरा मान गए... माफ़ कर देना भाई... शब्दों की माला जपने और बाजीगरी दिखाने  की कभी जरुरत नहीं हुई... और न दुनिया को बदलने की रत्ती भर कोशिश की... हम तो इतना भर लम्हा को रौशन करते हैं कि अपनी यायावरी कायम रहे... बाकी कुछ रहे न रहे.... आज भी खोने को इतना कुछ बचा है कि अपने आसपास अनगिनत मंजर बिखरा हुआ है...

..... फिर आगे.... राहुल 

23 December 2011

जाते-जाते

 
साल २०११ अवसान की ओर है. कुछ दिन, कुछ पल के बाद फिर उतनी सी तलाश की जद्दोजहद में डूब जायेंगे हम सब. वर्ष की शुरुआत में हमने यकीनन कुछ भी तय नहीं किया था. किधर जाना है... और किस मकसद को जीना है ? ऐसा भी नहीं था कि अपनी मर्जी से कुछ अलग  सोच लेते. समय ने कभी इतना मौका नहीं दिया. हमारे जैसे लोगों का इतना ही अंजाम होता है... मुझे यही लगा.. आप कुछ फासला तय नहीं करते.. पर कभी-कभी उनके लिए अकेले चलना पड़ता है... जो आपके सफ़र में कभी नहीं होते.. लेकिन वो हमेशा आपके हमसाया होते हैं.... न तो इसे कोई देख सकता है और न ही कोई इसे समझ सकता है..  इस साल हमसे बार-बार एक ही सवाल पूछा गया... मैंने हर बार जवाब दिया.. जब मेरे सामने अपने लिए एक सवाल आया तो सच मानिए.. मौसम बीत चुका था. हमने अपने हिस्से का वो खाली पन्ना भी खो दिया.. जिस पर कभी भी  मेरे लिए कुछ भी नहीं लिखा गया. वैसे कितने अधूरे पन्ने आज भी मेरे साथ हैं.. मै तो हमेशा यही चाहता था कि इन्हें उन्मुक्त आसमान में छोड़ दूं .. पर इन्होंने मुझे सीने से लगाकर रखा. आज जब मैं इन्हें फिर से अपनी बात दोहराता हूँ तो कोई कुछ नहीं बोलता. इन्होंने भी वही किया.....

 .......फिर आगे ....... राहुल 

19 December 2011

 
गुनगुनाती रातों में
निढाल होती यादें..
भूले-भटके मोड़ पर
लौटकर आती यादें
माँ के किस्सों में
पनाह मांगती यादें
वक़्त-बेवक्त दामन पर
दाग लगा जाती यादें
चुप रहने की आदत में
सब कुछ कह जाती यादें
तेरे चेहरें की शिकन में
रोती-हंसती यादें
ग़ुरबत की चादर में
खामोश सी यादें
                                                              राहुल....

03 December 2011

क्या सच में ऐसा होता है ?
जलते जख्म की
वेदना ताउम्र सालती है.....
क्या सच में मन
का काफिला चुप
रेत में फिसल जाता है...
मै उस वेदना को
बार-बार कहीं छोड़
सन्नाटा को जी लेता हूँ....
तुमने कुछ रेत की
बूंदों को होठों से छुआ था
क्या सच में ऐसा होता है ?
तेरी शहद घुली चुप्पी
में आहों की ...
क्या सच में ऐसा ही होता है ? ....

23 November 2011

उस आकाशगंगा में ...

गुलाबी बादलों की एक आकाशगंगा है
कुछ मद्धिम सी चुभन है
सिमटते हुए उजालों के पार
डूबता हुआ पानी है ...
कितना ठहराव हो सकता है ?
उस आकाशगंगा में ..
उतना ही शब्द..
वही शाम रहने दो..
अनायास मुस्कान दिखती  आकाशगंगा  में
शोर सी उठती हुई
घायल पहाड़ों की ढलान पर
तुम आती-जाती रहती हो...
तुम हवा को अपने होठों से
धराशायी करने की जिद में बैठी हो
पर ऐसा नहीं.. कभी नहीं..
पिघलती हुई सिर्फ वो शाम
मेरे आकाशगंगा में जी उठी है..
अलबेली बारिश की बूंदों में
तुम गुमसुम सी चुपचाप
पास ही तो मेरी बारिश में
भींगी सी मदहोश थी...
न जाने नींद का भ्रम था
या .. सच में एक अप्रतिम मखमली स्पंदन
                                                                                               राहुल...

20 November 2011

छोटी सी इबादत- 12

कैप्शन जोड़ें
अपनी मर्जी से आखिर हम आवारगी तय नहीं कर सकते. मै उस पेड़ को आज भी नहीं भूल पाती... जिसके दरख्तों में भी इतने जख्म कि मन सब कुछ खो बैठे. नहीं समझ सकी..... तुम इन सब के बीच क्यों डूब गए ? सुबह- सुबह की गीली और चमकते सूर्य की मीठी धूप में अनायास तुम्हारा दिखना.. अगले पल की वीरानगी में नजरों का सूनापन. सदियाँ थक जायेगी.. और मुमकिन है कि इतना मंजर गुजरे कि मौसम को एहसास तक  न हो..तुम पत्थरों की पदचाप को भी जी लोगे. तुम हमेशा कहा करते थे.. सब कुछ मौन कर देना.. मगर तुम अपनी साँसों की उमस को कहाँ मिटा पाओगे ? रात के थकते मन कारवां सा होने लगता है. जैसे सपनों को अपनी यात्रा में तलाशने की ख्वाहिश.. पर ये क्या... मेरे आँचल में एक कतरा तक नहीं बचा. न जाने इतने ही  ख्वाब तक मेरी पलकों पर टिक पाते हो.. न जाने फिर कभी अपनी हाथों में तुम्हारी उमस को कैद कर पाउंगी ? 
                                                                    आगे अभी और भी .....
                                                       
                                                                                                                                                राहुल

02 November 2011

तमाशा सा हुआ है...

छाने लगे ठण्ड के एहसान
कुछ बादल चुपचाप तमाशा सा हुआ है
एक संकरी गली में अँधेरा घूम रहा है
इंतज़ार कि...कुहासे के साथ मिल जाए तो...
कितना क़यामत सा पल होगा..
                                                             राहुल
 रात चुपचाप दबे पाँव चली जाती है
रात खामोश है, रोटी नहीं, हंसती भी नहीं
कांच का नीला सा गुम्बद है, उड़ा जाता है
खाली-खाली कोई बजरा - सा बहा जाता है

चाँद की किरणों में वो रोज़ सा रेशन भी नहीं
चाँद की चिकनी डली है कि घुली जाती  है

काश इक बार कभी नींद से उठकर तुम भी
हिज्र की रातों में ये देखो तो क्या होता है ?........


                         (गुलज़ार साहब के पुखराज से ) 

30 October 2011

मै..नहीं...हम...नहीं...

 
तुम मेरी निगाहों को गैर कर दो.
इतना ही तो होना था...
मेरा लम्हा खुद कहीं पैवस्त रहा होगा .
सच में.. ये अकस्मात् नहीं था
तुम मेरे लिए खाली हाथ ही तो आये थे......
इतना कुछ भी आसान गर होता....
जबकि किसी का वजूद
तेरी लकीरों में चस्पां था.
सदियों से .....
तुमने दो लकीरें खींच रखी है..
एक.. जिसमें मैं उसके जद में रहता हूँ.
दूसरा ...तुम उस लकीर के आसपास
आडम्बर का घेरा रचती हो...
मै..नहीं...हम...नहीं..
हजारों सागर का आर्तनाद
मेरी साँसों में टूटता रहता है......
सच में ...ये सब अकस्मात् नहीं होता ..

                                                                                     राहुल




29 October 2011

रात नहीं होती .....

रात जो ठहर जाती है.
रात जो गुम हो जाती है.
रात जो परिंदों को ....
अपनी कहानियों का हिस्सा बनाती है..
शायद उस रात का अपना आशियाँ नहीं होता...
रात का अपना संबल नहीं होता.
बच्चे दूध की भीनी महक
रात में गुनगुनाते हैं...
कुछ सपने लड़कियों के ..
रात में टिमटिमाते हैं..
रात जो ठहर जाती है
रात जो सभी तिनकों को
अपने घोंसला में सजाती है ..
शायद उस रात का अपना मकान नहीं होता..
प्यार की चिट्ठियाँ रात में,
तन्हाई....रुसवाई  रात में,
अलबेली कायनात रात में,
पत्तों पर गिरती ओस....
 रात में बुनी जाती है ..
शायद उस रात का अपना कोई आइना नहीं होता
रात के सफ़र में यकीनन अपनी कोई ....
रात नहीं होती ................


                                                                                     राहुल

27 October 2011

छोटी सी इबादत -11

तुम ...कहाँ सो गए...
...किसी को भी शायद भ्रम सा हो जाए.. कहीं तो कुछ नदियाँ घुलती रहीं होंगी..तेरी कतरन ....बिलीन होती पातालगंगा में मिल जायेगी...मुझे भी एक भ्रम ने जिन्दा रखा है.मै हमेशा तुमसे कुछ चुराती रही हूँ...तुम जानते भी थे इस बात को..  पर तुम मुस्कुराते रहते थे. खुद की खींची लकीरों पर जो इंसान हांफता.. थका-मांदा अभी लौटा है ...वो तो सिर्फ चुप रह सकता है......और ऐसा ही हुआ भी.......
 मै इतनी सारी नदियों के शाप से कैसे मुक्त हो सकूंगी..तुम तो सभी जगह, सभी धाराओं में मचलते हुए बिलीन होते रहे..कितनी कतरन समेटेंगे आप ? आज वक़्त किसी मोड़ पर नहीं खड़ा है, बल्कि खुद के कटघरे में संताप की दुहाई दे रहा है.... मुझे छोड़ दो..मुझे गुजर जाने दो..मुझे उसी धुंध में गुम जाने दो.....मुझे होश नहीं है अब......तहसीम मुनव्वर की सिर्फ एक लाइन ...जाने तुम कैसे सो जाते हो ? ....जाने तुम कैसे सो जाते हो ?........

                                                                        राहुल

14 August 2011

हाथों पर कुछ रखकर

चले तो गए....
जितना कहते थे
हाथों पर कुछ रखकर
 मौन ..बिना कुछ
मांगे...
 सराबोर अपने...
संताप को चिपकाये..
 चले तो गए..
असहज..कातर
 साँसों का गला
घोंट ...चुपके से
उतना ही छोड़ ..
 चले तो गए..
एक-दो उदास पेड़
के आसपास ..
किस्सा रोप कर
 अपनी नज्म का
 चुपके से
...  तुम चले तो गए................

                                                                  राहुल

सांझ में सना हुआ

अपने मन से हटा देना
इतना संबल सजा कर रखना ....
आगे गहरी तपिश की...
रात हो शायद
जो कुछ भी कहा...
सब सांझ में सना हुआ

छोटी--छोटी थालियों में
भींगी हुई ...
अनमनी सी पड़ी रोटियां
बुझती हुई चूल्हे की
 डूबती हुई कहानियां
अपने मन से हटा देना

टूटे घरों में निढाल नींद
 रात के मजार पर...
 खुशबू में लोटते
लौटते पलों को
वापस मत आने देना

 परिंदों के काफिले में
टिमटिमाती नन्ही तितलियाँ
बसेरा तलाशती ...
भींगती....भागती
अनबूझी पहेलियाँ
यूं ही ....
अपने  मन से हटा देना

                                                        राहुल

13 August 2011

मखमली चाँद के पार

       चाँद के पार की दुनिया ... कितना मखमली ... कितना शीतल...हम कई जन्मों तक उसी में अपना सब कुछ तलाशते रहे ...तो क्या मिलेगा ? शुरू से अंत तक न जाने कितनी राते टूट कर तारों में मिल  जाती है और हम  ताकते रह जाते हैं ......मै अपने आप से कह नहीं पाती ...आपने एक ख्वाब दिया ....कितना  मदहोश कर  देता है आज मेरे हाथ में अपनी कोई कहानी नहीं......

       ...कच्ची उम्मीदों  को कभी बारिश की अदाबत महँगी पड़ती है.. तो कभी सन्नाटों में डूब जाने की चिंता ..आज आप अपने मन से कितने दूर हो गए हैं..चाँद से भी बहुत पार.. मगर मैंने आपको जाने कहा दिया...थोडा सा मैंने चुरा लिया..मेरे चारों तरफ पश्मीने की एक नाजुक और नर्म दीवार है..दम घुट जा रहा है और चाँद मखमली आगोश में कैद है..हर तरफ राख में लिपटी तुम्हारी पवित्र साँसे तड़प रही है.. इतना सा मंजर दे गए हो तुम ....न...न..आप.. कभी जी में आता है .....आज की रात के बाद उसी राख में मिल जाऊं ....आप इतना  तो एहसान करेंगे मुझ पर ...पर सहर की उम्मीद नहीं ...चाँद थोडा सा बाहर निकल रहा है अपनी आगोश से ....हम कितना बेवश हैं..मेरी भी मजबूरी रही होगी...कच्चे रेशम में लिपटी एक लड़की सदियों से अपना  लिबास बुन रही है ...पर हर  बार एक सिरा अधूरा रह जाता है...कोई देह को पा लेता है तो कोई आत्मा को चुपके से अपनी  पूरी कायनात में समेट लेता है...और चाँद के पार की दुनिया  में  गुम हो जाता है ...ठीक आपकी तरह.....

                                                                                                                        

12 August 2011

[Image]
अभी कुछ वक़्त पहले ही एक वाकया हुआ. हमने किसी को कुछ शब्द वादे में दिए. फिर बात ख़त्म हो गयी. हम सब मगन हो गए... पेड़ों पर नए मौसम के पत्ते आने लगे. सब नया सा हो गया. वादों में दिए गए शब्द मेरा पीछा करते रहे ... मै चुप रहने लगी ... कुछ भी किसी से कहा नहीं .. एक पल को लगा कि कही एक तार का सिरा टूट गया है. मै उन अधूरे वादे को लेकर पशोपेश में थी. जाहिर है शब्दों की तलाश बेपरवाह हो गयी.. मंजर जाता रहा .. पत्ते जब बिखर कर जमीन पर आये तो एक सदी गुजर चुका था.... वक़्त ने एक सलाह दी थी.... मुझे अपने आसपास से मिटा देना.. गर ऐसा नहीं कर सके तो राख तक नहीं बचेगी .. अपने सामने की तस्वीर से अपनी छाया समेट लेना.. सबके लिए यही मुनासिब होगा.. सनातन काल तक.....तुम कितना अपना सा कहते थे... ये सच भी था .... तुम जो भी थे... बेहद निर्विकार ... चोट खाते रहने की आदत में बेमिशाल थे ... शायद तुम्हारे दिए हुए शब्द मै सहेज नहीं पायी ... लगा ही नहीं ... कि मै तुम्हे कुछ प्रतिदान दे सकूंगी .... उसके बदले ... मन में एक वहम का सन्नाटा है... कैसा पल ... सब आसान नहीं .. तुम तो उन्ही शब्दों की खाक में यायावर होगे... सच ... एक यायावर से ज्यादा कुछ नहीं थे तुम ......... मैंने हमेशा तेरे अन्दर तुम्हें तलाशने की कोशिश की .... यह कितना मुश्किल था. कभी भी तुम......

29 July 2011

ऐसे ही डूब जाते हैं ...

जब कोई चेहरा था 
कुछ अपने पल सा ...
आधी सी जमीन पर 
एक उम्मीद उगी थी ...
मखमली घास पर 
वही चेहरे ....
वही पल .....
वही उम्मीद ...
काँटों की जद में घिर गया 
कुछ कहा नहीं ...
रोया नहीं ...बस जीता रहा .....
हम सब ऐसे ही डूब जाते हैं ...
हम ऐसे ही प्रारब्ध जीते हैं .....
जब अपना कुछ नहीं होता 
कुछ बारिश की नेमत है 
कुछ तिनकों का आसरा 
हम सब ऐसे ही डूब जाते हैं ...
                                                                          राहुल

22 May 2011

छोटी सी इबादत - 10

 
मौसम ...  जो इस बार आया और चुपके से चला भी गया .....न तुम कुछ कह सके .. न वो कुछ याद दिला पाया... पर कुछ साथ चिपक सा गया ... जेहन में ... ये बताने को कि हम किसी वक़्त के यायावर सा तुम्हे देखते और खोजते रहेंगे ..... कोई एक दिन ही तो होता है ... समेटने को ... खुद को भिंगोने और कही डुबो देने को ... शायद वो भी नहीं एक पल के कतरे में कितना एहसास सिला हो गया .... तुम जब देखोगे ... फुरसत में ...बंद आँखों से .... हमने तो वो भी कहीं खो दिया... धीमी सी ... सिली ... सी आंच पर कोई तुम्हे पिछले जन्मों से एहसान बटोरने वाला आदमी मानकर खोजता फिर रहा है .... कुछ दुबिधा तुमने तय कि ......जैसे सब कुछ कोई और किसी का अकेला हो... मैं ऐसा तो नहीं जानता...फिर ऐसा मौसम ... बारिश .....बूँदें ......आएगा नहीं ....तुम कही और होगे और मुझे इतना मालूम है कि तुम सबको माफ़ कर दोगे......मै ठीक   जानती हूँ .......तुम ऐसा ही करोगे ....... 
                                        अभी और भी .............राहुल

02 May 2011

राजेश के लिए

प्रिय राजेश,
                     उम्मीद है आप सानंद होंगे. काफी अरसे बाद याद करने के लिए धन्यवाद. मुझे बहुत अच्छा लगा आपका कमेंट्स देखकर. सच कोई मेरे शब्दों और उसके इर्द-गिर्द की दुनिया को इस कदर नोटिस लेता है. कभी- कभी यकीन नहीं होता. आपने मेरी कविताओं को पढ़कर जो भी अबतक मतलब निकाला, वो मेरे लिए अमूल्य है. इस बात को कहने में मुझे कोई भूमिका बनाने की जरुरत नहीं है. मुझे सचमुच बहुत अच्छा लगा.........
राजेश, मैंने अपने अपने लिए कोई लकीर तय नहीं की. यही वजह है कि मेरे जैसे लोगों का अंजाम कभी अपने मुकाम तक नहीं जाता. अधूरा रह जाता है.. इसके बावजूद चलते रहते हैं....जहाँ तक मेरे शब्द और उसके घेरे का सवाल है तो हम इतना ही कहेंगे कि वो सभी मेरे साथ हमेशा साये की तरह मुझसे लगे रहते हैं...कौन अपने अतीत को अपने साथ जिन्दा रखना चाहता है ? कोई भी नहीं.....मै भी नहीं..मगर  मेरा बहुत कुछ उसी में जिन्दा है. सबकुछ तो नहीं कह कह सकते....
... हमने कभी कुछ तय नहीं किया. हमेशा ये सोचा कि मुझे क्या नहीं करना है ? क्योंकि ... मुझे क्या करना है.. ये तो मुझे पता है. यहाँ हर रिश्ता आपसे समर्पण की उम्मीद करता है. माँ-पिताजी, भाई-बहन, पति-पत्नी और जाहिर है बच्चे... ये सभी रिश्ते आपसे अपने होने का एहसास दिलाते हैं और बदले में जाने-अनजाने कुछ उम्मीद कर बैठते हैं. ऐसा होता रहा है और सब दिन होगा....... मैंने भी यथासंभव उम्मीदों को पूरा करने की कोशिश की है. कितना क्या हुआ, ये नहीं जानते.... हाँ.. एक चीज़ और..  ये जीवन उनका है... जिसने जीवन दिया...मेरा इस पर कोई हक नहीं.... मै २४ घंटे इस बात पर अमल करता हूँ....
अब बात उनकी जो चुपचाप आपके सफ़र में शामिल हो गए.. न कोई रिश्ता, न कोई नाता...मगर आपके हो लिए.. तो सदा के लिए.... अब उनकी व्यथा, मेरी व्यथा..
राजेश... जब बहुत बहुत महीन धागे को सुलझाना होता है तो काफी धीरज और हौसले से उस धागे का एक सिरा खोजना पड़ता है. नजर नीची करके सुनना पड़ता है. ये बहुत आसान नहीं है... इसमें कई सदी  लग सकती  है. हमने कभी भी अपनी तारीफ़ के लिए शब्दों को नहीं लिखा. कभी भी नहीं.. ये कोई काल्पनिक या फिर कुछ नाम-दाम बटोरने का जरिया नहीं रहा... ये एकदम नितांत निजी और निजी.
राजेश, आप kaise galat हो सकते हैं ? और मै kaise आप को ignore कर du.
                                                                                                                  Rahul..