Rahul...

16 April 2011

छोटी सी इबादत-8

 
..कुछ यात्रा पहले की... खुशनुमा पल.. जैसा दिखा .. तेरे साये से बचना कहाँ आसान था. उसके पहले चेहरा अपनी कहानी सुना गया था. आत्मा बेजुबान जंगल  सा कही फँस गया था. क्या कहे ? आँखों में इतने ख्वाब.. फिर भी चुपचाप मौन.. हाथ जोड़े खड़ा मदहोश बेदम सी रात. ऐसे आप क्यों देखते हो ? कौन सा सन्नाटा तुमने बुना है मेरे लिए.... मैं  कहाँ कुछ चाहती थी...ठीक उसी पहर कुछ सपने टूटे.. कुछ जुड़े... जैसे बहुत देर तक धूल में सने  परिंदों का कारवां.. कोई निढाल.. पस्त तो कुछ आसमान को निर्विकार सा देखता..... सफ़र शुरू हुआ.. कही लौटना था... समझ नहीं आया.. घर लौटे कि कही से विदा हुए. आँखों में कुछ छुपाने के बेमतलब से मायने ... पत्थर, जंगल और कहीं-कही दीखते असहाय से इन्सान की गाथा... हम तो कही ज्यादा उजाला तलाश तलाशने की जद्दोजेहद में भींग रहे थे. कैसे हुआ ये सब ? न. न. न...... ऐसा नहीं होना नहीं चाहिए था.. कोई तो जरुर कहेगा, कितने लाचार हो गए आप ? भीड़ और उमस में डूबे हजारों चेहरे.. कौन जानता है..किसे फिक्र है... बैठ कर सोच नहीं पाया.. सांस टूटने लगी... लगा.. कौन सा प्रारब्ध.. तुमने जिया है ? खिड़की से देखा... सब कुछ छूट रहा है.. फ़ोन का इन्बोक्स खोला... कुछ सन्देश है मेरे लिए...कुछ खाए कि नहीं ? फिर कही और भटक गया ? क्या जवाब दे ? सफ़र ख़त्म होने को था.. पर कही कुछ नहीं... कितना मुमकिन है अपने को खुद से बाँट लेना.. सांझ ढल गयी.. रात थोड़ी देर में खामोश हो जाएगी.. तुम वहां से कही और होगे... जानती हूँ .. आपके बारे मेरे.. किसी को नहीं कहूँगी.. खुद से भी नहीं.... फिर जंगलों में सांस टूटती नींद... माफ़ कर देना.. मैं नहीं चाहता था उस पल को...
 
                                                     राहुल
  

12 April 2011

एक-दो नजरें..

 
कुछ सुनहरे राख का मंजर
बिखरा मिला
उस समर शेष में
जहाँ समंदर एक
काफिला सा...
पिघलते जज्बात को
अपने में भिंगोये
गुम हो रहा है...
कभी ऐसा भी हुआ
थके मन से
सपनों को मुक्त करना.. 
सौ संताप में... हर बार 
एक-दो नजरें..
जर्जर यायावर वक़्त 
हाथ से निकलता 
चेहरे का धुआं ..
और...
कुछ सुनहरे राख का मंजर
तुम नहीं भी कहोगे तो...
सिमट जायेगा..
तेरी साँसों में मेरी रूह
जन्म लेगी..
मै उस वक़्त शायद..
रहूँ.. न रहूँ
                       राहुल

06 April 2011

मुक्त कर सको तो...

मुझे सवालों के घेरे में
रहने को कहा गया..
जो भी कुछ मेरा छीन गया
कैसे कुछ स्पर्श..
चुपके से..
अलफ़ाज़ बनते-बनते
कही खो सा गया..
मुझे सवालों के घेरे में
रहने को कहा गया........
कितनी सी बिखरती
स्याह हसरतें
ओ... अभी पलकों पर जो शेष है
तेरे चेहरों की शिकन
में जो पल गुजरता गया...
उसे बस.. एक बार
हाँ.. इतना ही कह रही हूँ
दे देना..
..गर कही मेरे आँचल का कोना 
तुम्हे दिखे..
इतना सा सवाल.
और अब होने-न-होने के  फासले
मुक्त कर सको तो...
दे देना.....
                                      राहुल


22 March 2011

छोटी सी इबादत- 7

एक बूँद.. दो बूँद.. और न जाने कितना बड़ा समंदर.. कांच के इस पार की दुनिया.. अनचाहे पत्थरों की मार से बचती हुई.. रूक-रूक कर सांस लेती हुई.. देखना तुम.. बाहर का मौसम.. बाहर की हवा तेरे जेहन में पैबस्त न हो जाये......
 नीला आसमान.. कच्ची धूप.. और कांच के इस पार छनकर आती हुई तेरे भींगे हुए चेहरे की चटक यादें.. मै नहीं जानना चाहती आगे का कुछ भी.. फिर से मायने तलाशने की ललक.. तुम ही तो कहते थे... तेरे बगैर... तेरे बिना तपती हुई रेत पर नंगे पांव.. अनर्थ सा.. बेमजा.............
दोहरी जिन्दगी... जो कह दिया.. मान लिया.. अरे हाँ.. माँ भी कहती थी... शीशे की दीवार पर तेरे जैसा एक हमशाया दिखने लगा है.. बूंदों की दुनिया से वापस लौट सको तो लौट आना... अब कांच की दीवारों पर भी दूब की लत्तर उगने  लगी है..... 
                                                         आगे और भी.......                                 राहुल
                            
                  

नम सी तड़प

कितना सा गुजर गया..
बस इतना सा गुजर गया
वक़्त जो तेरा-मेरा था....
किस गली में ठहर गया

तेरे जो किस्से थे..
मेरी भी कुछ बातें थी..
बस दो बूँद सी कुछ रातें थी..
न जाने कहाँ  बिखर गया..

खामोश पहर का सन्नाटा.
मेरी पलकों पर पसर गया..
नम सी तड़प तेरी यादों का
मेरे शब्दों में संवर गया

कितना सा गुजर गया..
बस इतना सा गुजर गया
वक़्त जो तेरा-मेरा था....
किस गली में ठहर गया
                                                   राहुल

18 March 2011

होली में इतना ही...

रंग बातें करें...
बातों से खुशबू आये.....
दर्द फूलों की तरह महके
जो तू आये..............
                                        राहुल

16 February 2011

छोटी सी इबादत-6

 
 
लम्बी रातों में बोझिल से दिखते मन की यात्रा में तुम निर्विकार जब मिल जाते थे... तो न फिर कोई दर्द........... अब कुछ नहीं बताना... आत्मबोध में बहती हुई तेरी बातें... सालों बाद वही रात.. उतना ही दर्द...   कहाँ से कहाँ सब चले गए.. तुम्हारा नाम तो मेरे पास ही रहेगा.. उस शब्द का सीधा सा मतलब..  

अपने गाँव में जमीं की देहरी पर कदम रखते ही बिखर गया  सब कुछ.. सब उस किताब की तरह.. जिसके  शब्द खुद के पन्नों में अपना वक़्त तलाश रहा है.. उस जमीं को सीने में दफ़न करने को...कुछ अंश तो मुझमें मिलेगा.. कभी तुम आये थे मेरे घर.. और मेरे आँगन में चुपचाप...दूसरों को सुनते... अकेले... अचानक से सुनते-सुनते चले गए.. फिर वो मंजर नहीं आया...
खुद में इतना खो जाना...कितनी वीरानगी.. जितना अन्दर जाती हूँ.. एक बेतरतीब कविता आकार लेती है.. लगता नहीं कि अब तुम... मेरी इबादत का पन्ना पहले भी अधूरा था... आज भी वैसा ही... तुम्हें एहसास तो जरूर होगा.. और डूबोगे भी... मुझे तो रेत की डगर पर चलकर जाना होगा...  फिर से जतन...
                                                                                                               .........................आगे और भी

12 February 2011

छोटी सी इबादत- ५

 
तुम हकीक़त ही थे.. मैंने ही इसे कुछ और चोला पहना दिया.. न बन सके उस रिश्ते का इलज़ाम तुम पर कैसे लगा दूं ? जो फलसफा मै तेरे चेहरे पे पढ़ नहीं पाई.. उसका खामियाजा मेरी लकीरों को भुगतना तो होगा ही............ये उदास-उदास चेहरे, वो हंसी- हंसी तबस्सुम ......तेरी अंजुमन में शायद अब कोई आइना नहीं है
तुम जब सवालों में घिरते थे तो फिर उस घर में, अपने कमरे के एकांत कोने में तुम्हें देख मै.. ना कुछ समझ पाती और ना ही कुछ समझा पाती तुमको.. चाहकर भी.....! मुझे तुमने उस पत्ते की मानिंद उड़ने को छोड़ दिया.. जिसका खुद का चेहरा जर्जर था.. और बेजार भी... आज कहा चला गया सब कुछ.
.....अजीब सी अदा.. पूरी तरह नाटकीय चलता जीवन चक्र.. रंगे चेहरे.. एक.. पर एक.. सब्जबाग.. किसको देखूं.. किसको छोड़ दूं... अपनी इस दुनियादारी में खुद के एहसानों का बोझ खुद पर इतना ज्यादा है कि किसी और के लिए तुमको छोड़कर कोई नाम याद नहीं आता.
तेरे घर.. तेरे कमरे.. ओह...भींगते पन्नों पर चुपचाप उतरती हुई ओस.. उस चांदनी रात का कर्ज है.. जो अकेले मैंने तुम्हारे लिए मांगी थी.. रात के अधरों पर बेचैन.. थकी सी हंसी चस्पा है.. अलसाये रातों की अंतहीन कड़ी है.. कुछ अजन्मा सा.. भोर भी..
                                                                                                                             ...आगे और भी

08 February 2011

छोटी सी इबादत-4

 
....सब कुछ कल्पनातीत सा.. नींद में यथार्थ से लड़ने का बोध.. ओह.. कैसा होगा हमारे चाहने.. न चाहने के द्वन्द में पिसता हमारा लम्हा... कातिल भी वही.. मुंसिब भी वही.. ये कहना कि तुम्हारा अंजाम.. तुम्हारे हक में मुनासिब नहीं रहा.... मै नहीं मानती... जार-जार तो नहीं.. हाँ कहूँगी कई-कई बार...इतने जर्जर.. कमजोर और बेबस हो जाओगे... पता नहीं था......
कोई आइना तेरे मिजाज को पढ़ तो नहीं सकता... आज भी तेरे नाम व तुझको समझने की गलती बार-बार दोहराती रहती हूँ. अगर कायनात में टूटी-फूटी जरा सा भी मेरे दामन में कुछ सौगात मिलना बाकी हो तो.. बस इतना हो कि गलती बार-बार करूं..
मुमकिन इतना तो अब भी लगता  है कि भोर की पनाह में जब सांस डूबती-उतराती है तो अनंत यात्रा पर.. मिट जाने को मन करता है.. दिन चढ़ते चला जाता है.. फिर ख्वाब.. आसपास चिपके हुए उस सीलन का.. जो अनचाहा है.. अकारण है.. शाम होती है... फिर देखती हूँ.. और नजरें खुद की चुभन को बर्दाश्त नहीं कर पाता...,  चारों तरफ  शब्दों का आडम्बर है.. रिश्तों की अनकही व्यथा है... ये कौन सी सदी है.. ये कौन सा जन्म है... तुम कतरों में बिखरते हो.. मै चीखों में सो जाती हूँ.. ....            
                                                                     ......    आगे और भी

07 February 2011

खुद के साये का पहरा है...

काल के अन्तःघट में
जो सहरा में गुजरा है..
खुद के साये का पहरा है
वो कौन है.. वो कौन है...
निर्दोष रेत के गर्भ में.
बेमन सांसों की परवाज है
उदास वन की रश्मियों में
नब्ज थमती हुई आवाज है
वो कौन है.. वो कौन है...
कुछ दर्द नाजुक पानी  है
नीरव उम्मीद रोमानी है
काल के अन्तःघट में
जिनकी बेलौस कहानी है
वो कौन है.. वो कौन है...
ना तेरा पल..ना मेरा पल
सांझ पहर के क़दमों में
गुमसुम सा जो ठहरा है
खुद के साये का पहरा है
वो कौन है.. वो कौन है...                     
                                                राहुल

05 February 2011

छोटी सी इबादत-३

 
.....कितनी बातें छूट जाती है.. सूनी-सूनी गलियों में हजारों मंजर भटक रहा है. उसी मोड़ पर... वक़्त की शाखों पर जो लम्हा टूट कर उन गलियों में बिखरा हुआ है.. सोचती हूँ.. उन्मुक्त आकाश में छोड़ दूं.. परिंदों की उड़ान में समाहित कर दूं. लेकिन ऐसा होगा.. लगता तो नहीं.. सच.. .....कितनी बातें छूट जाती है.. अथाह आसमान का गुनाह क्या हो सकता है ?  वो तो सब कुछ कैद करने को आतुर है. मै भी उस आसमान में ना तो बिखर सकी और न मिल सकी. आकाश आज भी कहता है....... गुजारिश करता है...... मगर..  तुमने कहाँ मुक्त होने दिया.. ना तो खुद में मिलने दिया और ना ही बिखरने दिया... इतना तो मै भी जानती हूँ कि कच्चे रेशम जैसे नर्म रिश्तों में पाने की कोई लालसा नहीं थी.. तुम यही चाहते थे.. सच तो ये भी है कि तुमने कभी कुछ चाहा ही नहीं... तुम आज भी वैसे ही होगे... 
......मुझे सपनों से सदा ही विरक्ति रही. अभी तो अभी... मिले ना मिले.. तुम्हारी बातें थोड़ी जुदा थी. एहसास इतना करती थी कि  तुम अपने अंतर्मन में कुछ गढ़ते रहते हो.. कभी-कभी तुम्हें देखती तो मालूम होता.. आज के सफ़र में मुझे सपनों की परीकथाएँ जीने के लिए तुमसे कुछ माँगना पड़ता है.. सब कुछ नीरव सा.
कहना असंभव है..जाने सो जाने..जिए सो जाने.. अनुभव हो जाये.. कबीर तो इतन ही कह गए.. जो भी अपने शीश को रख दे, ले जाये जो भी अपने शीश को गिरा दे, उस पर बरस जाता है प्रेम का मेघ, बहने लगता है उपर से, बंटने लगता है दूसरों को... और ऐसी मुक्ति.. जहाँ मोक्ष की भी चाह नहीं.....

                                                                                                                              आगे और भी...

04 February 2011

छोटी सी इबादत- 2

 
..... मै तब जानती थी कि बारिश की बूंदों का तुम पर कोई खास असर नहीं होने वाला. कितना हल्का सोचती थी. तुम हमेशा दूसरों को माफ़ करते थे. आज भी करते होगे. तुम यहाँ जस का तस रहोगे.
                   बारिश की कतरनें थोड़ी देर के लिए राहत  तो देती है.. बाद में उमस का सैलाब दम घोंट देता है. घर की देहरी और छतों पर तुम अनायास दिख जाते तो.. कुछ टूट जाने को होता.. मगर तुम ओझल हो जाते.. ये चुभ जाता. तेरे कमरे में सब कुछ करीने से होता.. चुप सा किस्सा बुना जाता.. जब तुम नहीं होते तो मै एक-एक चीज को देखती.. आत्मसात करती. और जो समेटना होता वो समेट लेती. जिन कामों के लिए उस कमरे में जाना होता.. वो काफी उमंग से होता.. लेकिन तुम चुप रहते. कभी- कभार तुम कुछ कहते तो अनायास ही सब कुछ बैठ जाता.. मन को आखिर एक असीम लज्जत की जरूरत होती है.. शब्द बेमानी हो जाते हैं अगर चुप्पी सटीक निशाने पर चुभ जाये.. तुमने यही किया.. कितनी बड़ी सजा दी है तुमने ? खुद को भी तो नहीं बख्शा तुमने. आज जहाँ कही मै हूँ और जहाँ तुम... वो करीने सा कमरा मेरे साथ-साथ रहेगा... तो तेरे पास मंद-मंद सी चुप्पी......
                  एक अकेला कोई कैसे तनहा रह सकता है ? दरअसल ये खजाना एक नेमत है. सदा सँभाल कर रखने के लिए.. ये नेमत जितना बिखरता है.. उसकी खुशबू उतनी लरजती है.. जितनी तपती है.. उतना ही निखार आता है.. वक़्त तो मुगालते में है कि सजा हमने तय कर दी.. अब भुगतो और प्रारब्ध को जीते रहो.. मगर ये पूरी तरह एकतरफा नहीं होता.. चलो.. स्वीकार किया.. देखेंगे.. किस्मत की लकीरों में कौन सी पर्ची निकलता है.. वक़्त का क्या है...........
                  ....... हाँ.. तो तुम कुछ मेरे लिए लाये थे.. कहाँ  से कहाँ खो जाती हूँ... शून्य में जन्मी यादें... आज तो सब कुछ भूल जाने को मन करता है... मन करता है कि  बीच गंगा की लहरों में विलीन होकर समाधि ले लूं.. तुम कुछ और भी थे... यह तब दिखा.. मेरे पास इतना ही शेष रह गया है.. तुम्हारे लिए सोच नहीं पाई कि क्या.......
                                                                            अभी और भी

03 February 2011

छोटी सी इबादत


 

कितना बदल गए. आँखों से दूर होकर भी तुम सबकुछ थे. कल भी रहोगे. चुप रहने की तुम्हारी जिद कभी खत्म नहीं होगी .तेरे नाम का मतलब कभी मुझे बताया गया था. छोटी सी इबादत में सिर्फ तुम ही थे. आज भी हो...
                        याद है तुम्हें.. शायद याद होगा.. एक बार भींगे मौसम में तुम बारिश में सराबोर होकर आये थे. मै चुपचाप तुम्हें देख रही थी. तुमने भी मुझे चुराकर देख लिया था. वो भींगा दिन हमेशा मुझसे चिपका रहा. तुम उस दिन कुछ कहना चाह रहे थे. वैसे तुम हमेशा खामोश रहते थे. मगर वो दिन मेरा था. मेरी कुछ मन्नत पूरी होने वाली थी. तुम बारिश में निमग्न थे. मै तुममे.. कितना अजीब था वो पल. उस घर में तुम हवा की तरह दिखते थे. घर से जब निकले तो चीख सा सन्नाटा.. और जब घर में लौट कर आते  तो दरवाजों के साथ कई चीजें खुलती.. मन... आत्मा और न जाने क्या-क्या ? तुम भागते.. और एकदम से दूर हो जाते.. तेरे घर में होकर मै सबकी थी.. सिर्फ तुम नहीं... खैर.. बात उस मौसम के गीले पन्नों की हो रही थी. मै हमेशा.. हर पल... तुमको खोती रहती.. 
           तुम कही और रहते.. मै हरपल तेरा अक्स तलाशती रहती. ठीक उस तरह.. जैसे साया को समेटने की जद्दोजेहद करती उम्मीदें.. जैसे साँसों में ग़ुम होती कहानियां...  आगे और भी


  

18 January 2011

जिन्दगी से मिले.........

                                                       जब कभी हम यूँ जिन्दगी से मिले
                                                       अजनबी जैसे अजनबी से मिले......
                                                       फूल ही फूल हमने मांगे थे
                                                       दाग ही दाग जिन्दगी से मिले.........
             
                                                                                          courtesy by-  classic story - jagjit singh

17 January 2011

देर से.. मिले

तेरी मर्जी के
सफ़र में
सोचा था...
 कहीं मिल जाता
वक़्त जो इतना था..
काँटों को समेटते..
बटोरते
तेरे अल्फाज
बिखर गए
उस सफ़र में
जहाँ..
घर आये मेहमान
जैसा दिखा
तेरे आँगन का रास्ता
जलती-तपती
वीरान सी बिखरती नींद
देर से.. मिले
कोई हद..
न तो तेरे नाम पर ..
जो सोचा था 
जीया था
 भोर में जन्म लेती
तेरी सदी के पहर में
बिखर गए
जहाँ तुम्हारे बाद
कोई चेहरा
आईने सा..
अब नहीं दिखेगा
जो बचेगा......
जलती-तपती नींद
उसी सदी में
 तेरी मर्जी के
सफ़र में... शायद
होंगे........
                             राहुल

                                       


 

15 January 2011

मुनचुन के मन से...४

... गाँव के माहौल में बेफिक्री का जो आलम था,  वो शहरों में ख़त्म हो गया. मुझे आज भी यही महसूस होता है कि कम पढ़े लिखे लोग कितनी ईमानदारी  से अपनी जय-पराजय, गिला- शिकवा और हर पल की जद्दोजहद को सामने रख देते हैं. जितने चेहरे, उतनी बातें... दरअसल हम सब अपनी- अपनी व्यथा को जीते हैं. काल के गर्भ में पनपते एक आम आदमी के पास ऐसा कुछ भी नहीं होता, जिसे वो अपना कह सके. अगर कुछ अपना होता है तो वो है जुर्रत... हमेशा जिन्दा रहने की, सुकून से जीने और आने वाली पीढ़ी के लिए कुछ जमा करने की.. ऐसे लोग हर वक़्त किसी दोराहे पर पहुँच कर ठिठक जाते हैं. ठगे जाते हैं. मुझे नहीं लगता कि उम्मीदों का सूरज उनके जीवन में कोई पुंज फैला पाता है. आधी जिन्दगी इसी में कट जात्ती है और आधी जिन्दगी का कोई हिसाब बन नहीं पाता.
मुझे वो पूरा मंजर अब भी सामने  दिखता है. घर में सामंती परिपाटी को जीने वाले कई लोग मुझसे कहते कि तुम जो सोचते हो, ऐसा यहाँ नहीं है. तुम अपनी  नेकनीयती अपने पास रखो. पटना में जो करते हो, वही करो. और भी बहुत कुछ.. सुनता. देखता रहता... पटना में जहाँ घर है. मेलजोल के अपने नजरिये से आसपास के बहुत लोग मेरे करीब नहीं आ सके. ऐसा भी कहा जा सकता है कि मै ज्यादा नहीं मिल पाया. हाँ.. ये जरूर हुआ कि आत्मीय होकर जब भी किसी के काम आया तो धारणा बदलते भी देर नहीं लगी. मुझे भी वक़्त-दर- वक़्त किसी की जरूरत हुई तो लोगों ने साथ दिया. आज भी आसपास के बहुत कम लोग जानते हैं कि मीडिया सेक्टर में मै हूँ .. 
     ...... शेष

14 January 2011

पलकों की कतारों में

.. सिर्फ तुमको समेट लेती
छुपा देती
समय से
 जो लौट कर आती
समय की कहानियां
तेरी आँखों के..
साए में
जिन्दा होती
अप्रतिम सा स्पर्श..
मुझे वापस कर दो
सपनों के शोर में
आंच सी बर्फ में
समय की कहानियां
मुझे दे दो...
जहाँ  सिर्फ..
इतना शेष..
कभी निगाहों से
जो सौगात दी..
पलकों की कतारों में
सिर्फ तेरा नाम 
तेरा स्पर्श..
पूरा वजूद
समेट लेती
.. जो लौट कर आती
समय की कहानियां

                                       राहुल

12 January 2011

मेरे सूखे पत्तों में

 
पहले जब तुम
घर के कोने में
मिलते थे..
तुम मेरे नहीं थे..
मै देखती रहती थी
तुम्हें किताबों में.
सूनी-सूनी सी
घर की छतों पर
नींद में तुम..
यदा-कदा तुम दिख
जाते..
आते-जाते
दूर भागते रहते थे..
थमती साँसे..
हवा को समेटने का जतन
बेवस सी होती..
मेरी नींद
तुम हवा में सिमटे..
तो सूखे पत्तों का
मंजर
पानी  पर तेरी-मेरी
किस्मत
किनारे-किनारे
दूर जा चुकी थी..
तुम आ नहीं सके
पर.. मेरे सूखे पत्तों में
तेरी किताबें
तेरी ख़ामोशी
शायद..
मिल जाए..
                                      राहुल

11 January 2011

मुनचुन के मन से.. ३

..... जब मुझे यह लगने लगा कि घर के कई मसलों पर कई लोगों से मेरे मतभेद हैं तो मैंने इसे स्वीकार किया. मुझे यह बात मानने में कोई गुरेज नहीं कि भावना और मिजाज के स्तर पर मेरी कई लोगों से पटती नहीं थी.. यह आज भी है.. दरअसल हम सभी लोग अपने सफ़र की कहानी में खुद रंग भरते हैं. कैनवास खाली हो या बेरंग.. तय हमें करना होता है.. रंग तो आपके आसपास सागर सा फैला है.. साइंस का स्टुडेंट होने के बावजूद मेरे कमरे में हर नामी गिरामी लेखक की बुक्स दिखती.. पढता और डूबता रहता.. उन दिनों सोचता कि किताबें सब कुछ होती है.. मगर ऐसा आज नहीं लगता.. इतने वक़्त में कितना लम्हा गुजर गया.. कितनी पीर सी जिन्दगी समय के लिबास में जमींदोज हो गयी..
१९९५-९६ के बाद तो मामला और संजीदा हो गया.. थोड़ा- बहुत कलम उठने लगा.. जो तबीयत पर गुजरता.. वो शब्दों में ढलता.. बादल.. हवा.. धूप.. पानी और ना जाने क्या- क्या.. आसपास मौजूद रहते. गाँव जाता तो खूब घूमता.. खेतों में काम करते लोगों में शामिल होता तो घर के कई लोग डांट-डपट करते.. लेकिन मैंने कभी परवाह नहीं की.. अपनी मिटटी को समझने की सनक बनी रही.. वो आज भी कायम है.. 

मुनचुन के मन से.. ३                          ...शेष

09 January 2011

ख़त के शब्द..

 
जब कभी आये
अश्कों की चांदनी में
नहाये..
तुम पलट कर
अपने हाथों में
थाम लेना
तड़प  की कशिश..
 मै कल भी मौन थी
गंगा में बहते तेरे
ख़त के शब्द..
और..चित्कार में
बिखरती तेरी हंसी
मै कल भी मौन रहूंगी .
सिर्फ...
इतना वक़्त होता है..
मेरे हाथों में
जब अश्कों की चांदनी में
सौ मौसम रोते हैं
हजारों शब्द डूब जाते हैं
                                             राहुल